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राजस्थान के लोकनाट्य | Folk theater of Rajasthan
Rajasthan GK for RSMSSB JEn Exam 2025
Rajasthan GK for RPSC AEn Exam (Pre.) 2025
राजस्थान में क्षेत्र विशेष में निम्न लोक- नाट्य प्रचलित है :-
1. ख्याल 2. रम्मत 3. तमाशा 4. गवरी या राई 5. नौटंकी
6. स्वांग 7. भवाई नाट्य 8. फड़ 9. लीलाएँ 10. चारबैत
1. ख्याल 2. रम्मत 3. तमाशा 4. गवरी या राई 5. नौटंकी
6. स्वांग 7. भवाई नाट्य 8. फड़ 9. लीलाएँ 10. चारबैत
- राजस्थान में लीलाओं के दो रूप: रासलीला व रामलीला प्रचलित है।
- यह एक बहु प्रचलित लोक नाट्य है।
- इसकी कथा पौराणिक आख्यानों से ली जाती है, जिसमें धर्म तथा लोक तत्त्व की प्रधानता होती है।
- रासलीला -
- यह भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं पर आधारित लोक नाट्य है।
- रासलीला की उत्पत्ति बल्लभाचार्य द्वारा की गई।
- इसका प्रचलन भरतपुर तथा मारवाड़ क्षेत्र में अधिक है।
- सबसे पहला रासधारी नाटक लिखने का श्रेय मेवाड़ के मोती लाल जाट को जाता है।
- रासलीला को शिवलाल कुमावत ने विशेष रूप प्रदान किया।
- राजस्थान में 'फुलेरा' रासलीला का प्रमुख केन्द्र है।
- रामलीला -
- रामलीला भगवान श्री राम की जीवन लीलाओं पर आधारित है।
- रामलीला प्रारम्भ गोस्वामी तुलसीदास ने किया था।
- राजस्थान में बिसाऊ (झुंझुनूं), जुरहरा (भरतपुर), पांटूदा (कोटा) की रामलीला सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
- बिसाऊ की रामलीला मूक अभिनय पर आधारित है।
- चारबैत
- चारबैत राजस्थान के टोंक जिले में खेली जाने वाली संगीत दंगल लोक नाट्य विद्या है।
- इसमें मुख्य रूप से ढपली नामक वाद्य का प्रयोग किया जाता है।
- चारबैत लोक नाट्य शैली को प्रारम्भ करने का श्रेय नबाब फैजुल्ला खाँ के समय करीम खाँ निंहग व अब्दुल करीम खाँ को जाता है।
- इसमें गायक ढप बजाते हुए घुटनों के बल खड़े होकर अपनी बात गाकर कहता है
- इसमे कुछ गायक ऊँची कूद लेकर उछलते हुये भी गाते हैं।
- भवाई नाट्य
- भवाई जाति की उत्पत्ति केकड़ी (अजमेर) के बाघा जी जाट से मानी जाती है। इस जाति द्वारा भवाई नाट्य प्रस्तुत किया जाता है।
- यह विशुद्ध व्यावसायिक किस्म का नृत्य नाट्य है जो सगौजी व सगीजी के रूप में भोपा-भोपियों द्वारा किया जाता है।
- भवाई नाट्य तलवार व कांच के टुकड़ों पर एवं सिर पर कई मटके रखकर किया जाता है।
- भवाई शैली पर आधारित शांता गाँधी द्वारा लिखित 'जस्मा-ओड़न' नाटक भारत से बाहर इंग्लैण्ड व जर्मनी में भी खेला गया है।
- भवाई नाट्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना श्रेष्ठा सोनी को लिटिल वंडर की उपाधि से सम्मानित किया गया है।
- इस नाट्य में संगीत पख का अधिक महत्त्व नहीं है। बल्कि नृत्य अभिनय एवं कलाकारी का पक्ष प्रबल महत्त्व रखता है।
- इसमें कलाकार नृत्य के साथ-साथ विभिन्न चमत्कार भी दीखता है।
- भवाई नाट्य के प्रमुख वाद्य यंत्र - सारंगी, नफीरी, नगाड़ा एवं मंजीरा
- रम्मत
- बीकानेर तथा जैसलमेर क्षेत्रों में होली और सावन के अवसर पर होने वाली लोक काव्य प्रतियोगिताओं से रम्मत लोकनाट्य का उद्भव हुआ।
- रम्मत में राजस्थान के सुविख्यात लोकनायकों एवं महापुरुषों की ऐतिहासिक धार्मिक काव्य रचना को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है।
- रम्मतों के रचयिता सुआ महाराज, मनीराम व्यास, तुलसीदास, फागू महाराज और तेज कवि (जैसलमेरी) है।
- तेजकवि ने रंगमंच को क्रान्तिकारी नेतृत्व प्रदान किया और अपनी रम्मत का अखाड़ा श्री कृष्ण कम्पनी से शुरू किया।
- 1943 ई. में तेज कवि ने 'स्वतंत्र बावनी' की रचना कर इसे महात्मा गाँधी को भेट किया।
- बीकानेर में आचार्यों का चौक रम्मतों के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध और सुव्यवस्थित अखाड़ा है।
- बीकानेर में हेडाऊ मेरी की रम्मत, अमर सिंह राठौड़ री रम्मत तथा रावलों री रम्मत प्रसिद्ध है।
- 'हेड़ाऊ मेरी की रम्मत' का सूत्रपात स्व. जवाहर लाल जी पुरोहित ने किया। इसमें हेड़ाऊ कुंभलगढ़ का राजा व मेरी उसकी पत्नी है।
- रम्मत का आयोजन रात्रि को होता है ओर यह सुबह तक चलता रहता है।
- रम्मत शुरू करने से पूर्व रम्मतिए (कलाकार) रंगमंच पर बैठकर अपनी वेशभूषा व मेकअप दर्शकों को दिखाते है।
- रम्मत् खेलने वाले खेतार कहलाते है।
- संवाद मंच पर बैठकर गायकों द्वारा गाया जाता है तथा इसके मुख्य पात्र संवाद को नृत्य तथा अभिनय करते हुए स्वयं 'भी गाते रहते है।
- रम्मत की कुछ उल्लेखनीय बातें निम्न हैं -
- रम्मत में मुख्य वाद्य नगाड़ा तथा ढोलक होते है।
- रम्मत साहित्य का एक रूप है।
- इसमें रंगमंच की सजावट नही होती, मंच का धरातल थोड़ा सा ऊँचा बनाया जाता है।
- जो मुख्य गीत गाए जाते है उनका संबंध निम्न विषयों से होता है :-
- चौमासाः वर्षा ऋतु का वर्णन
- लावणीः देवी-देवताओं की पूजा से संबंधित गीत
- गणपति वन्दना
- रामदेव जी के भजनः रम्मत शुरू करने से पूर्व रामदेव जी के भजन गाए जाते है।
- मुख्य खिलाड़ी-स्व.श्री रामगोपाल जी मेहता, सांई सेवग, गंगादास सेवग, सूरज, जीतमल और गोड़ाजी (सभी बीकानेर)।
- गोड़ा जी अपने समय के प्रख्यात नगाड़ा वादक रहे है।
- तमाशा
- तमाशा लोकनाट्य परम्परा का विकास राजस्थान में 19 वीं शताब्दी मे जयपुर में प्रारम्भ करने का श्रेय पं. बंशीधर भट्ट को दिया जाता है।
- पं. बंशीधर भट्ट को सवाई प्रतापसिंह ने अपने गुणीजन खाने मे आश्रय देकर इस नाट्य विद्या को प्रोत्साहित किया।
- बंशीधर भट्ट के समय जयपुर की मशहूर नर्तकी गौहर जान तमाशे में स्त्रीपात्र का अभिनय करती थी।
- तब से आज तक भट्ट परिवार ने इस नाट्य शैली को जीवित रखा हुआ है।
- इस नाट्य में उस्ताद परम्परा फूलजी भट्ट द्वारा प्रारम्भ की गई।
- वर्तमान में गोपीचन्द एवं वासुदेव भट्ट तमाशा के प्रसिद्ध कलाकार है।
- रामसिंह द्वितीय ने इस कला को संरक्षण प्रदान किया।
- तमाशा के वाद्य यंत्र : हारमोनियम, तबला-सारंगी व नगाड़े इत्यादि।
- तमाशा की मुख्य विशेषताएँ निम्न है :-1. जयपुर में प्रचलित तमाशा, महाराष्ट्र के तमाशे से भिन्न है।2. इसमें संवाद काव्य मय होते है तथा इन्हें राग-रागनियों से निबद्ध करके प्रस्तुत किया जाता है।3. 'तमाशा" खुले मंच पर होता है, इसे 'आखाड़ा' कहते है।4. संगीत, नृत्य और गायन इन तीनों की 'तमाशे' में प्रधानता होती है।5. इसमें स्त्री पात्रों की भूमिका स्वयं स्त्रियों द्वारा भी अभिनीत होती है।6. गोपीचंद तथा हीर-राझाँ रसीली तम्बोलन प्रमुख तमाशे है।
- गवरी
- राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के उदयपुर, डूंगरपुर तथा बाँसवाड़ा क्षेत्र में बसे भीलों का लोक नाट्य है।
- इस लोकनाट्य का आधार शिव तथा भस्मासुर की कथा से है।
- गवरी राज्य का प्राचीनतम लोकनाट्य है, अतः इसे लोकनाट्यों का मेरूनाट्य कहा जाता है।
- इसका आयोजन रक्षाबंधन के दूसरे दिन से होता है और सवा महीने (लगभग 40 दिन) तक खेला जाता है।
- गवरी का मुख्य पात्र बूढ़िया भस्मासुर का जप होता है, और अन्य मुख्य पात्र 'राई' होती है जो स्त्री वेश में पार्वती और विष्णु की प्रतीक होती है।
- झामट्या नामक पात्र लोक भाषा में कविता बोलता है और खट्कड्या उसको दोहराता है और बीच-बीच में जोकर का काम करता है।
- बूढ़िया भी खट्कये के समय-समय पर संवाद में पूरक बनता है। शेष सभी पात्र 'खेला कहलाते है।
- कुटकुडिया इस नाट्य का सूत्रधार होता है।
- गवरी में पुरुष पात्र होते हैं।
- गवरी की समाप्ति पर दो दिन पहले जवारे बोये जाते है।
- गवरी के के कुछ मुख्य प्रसंग निम्न है: बादशाह की सवारी, शेर-सुअर की लड़ाई, खाडलिया भूत, भिन्यावड़ आदि।
- यह नाट्य भील जाति के पुरूषों के द्वारा खेला जाता है। इसमें स्त्रियों की भूमिका भी पुरूषों द्वारा खेली जाती है। इस नाट्य में पाँच मुख्य पात्र होते है।
- भानू भारती द्वारा रचित प्रसिद्ध 'पशु गायत्री' लोकनाट्य गवरी पर ही आधारित है।
- गिर्राज प्रसाद कामां वाले इसके प्रमुख कलाकार, नत्थाराम की मंडली ने भरतपुर, धौलपुर में प्रस्तुत किया।
- खड़लिया भूत, कानगूजरी, गोमा-मीणा, कालूकीर नाहर, लाखा बणजारा, माता और शेर, भियावंड, शेर सुअर की लड़ाई, हठिया अम्बाव, बादशाह की सवारी, बनजारा-बनजारी इत्यादि गवरी के मुख्य प्रसंग व लघु नाटिकाएँ है।
- कानगूजरी के खेल में मंजीरे और चिमटे बजते है तथा अन्य खेलों में मादल और थाली बजती है।
- गवरी धार्मिक लोक नाट्य है, जिसमें गवरी भीलों की मुख्य आराध्य देवी है।
- इस लोकनाट्य का आधार शिव तथा भस्मासुर की कथा से है। ऐसी मान्यता है कि
- भस्मासुर ने अपनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे भस्म करने कीशक्ति प्राप्त कर ली, तथा उसने पार्वती को प्राप्त करने के लिए शिव पर ही उसका प्रयोग करना चाहा।
- अन्त में भगवान विष्णु ने अपने शक्ति से शिव को बचाया और भस्मासुर का हाथ उसी के सिर पर रखवाकर अन्त किया।
- इसी सन्दर्भ में शिवजी ने भीलों के साथ नृत्य किया जो आगे चलकर गवरी के रूपी में प्रचलित हुआ।
- स्वांग
- स्वांग लोक नाट्य का महत्त्वपूर्ण स्वरूप है।
- स्वांग का अर्थ है किसी विशेष ऐतिहासिक पौरोणिक, लोकप्रसिद्ध या समाज में मान्य चरित्र तथा देवी-देवताओं की वेशभूषा धारण करते हुए हुबहू उनके चरित्र की नकल करना।
- यह लोक नाट्य की ऐसी विधा है जिसे एक ही चरित्र सम्पन्न करता है।
- स्वांग रचने वाले व्यक्ति को बहरूपिया कहते है।
- भरतपुर क्षेत्र में होली के अवसर पर स्वांग कलाकर विभिन्न वेशभूषाओं में स्वांग रचकर लोगों का मनोरंजन करते है।
- मारवाड़ में रावल जाति के लोगों द्वारा स्वांग रचाने की अति प्राचीन परम्परा रही है।
- धनरूप भांड की कला से प्रसन्न होकर जोधपुर महाराजा मानसिंह ने उसे जागीर प्रदान की।
- परशुराम भी इस कला के कलाकार है।
- बहरूपिया कला को राजस्थान से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक फैलाने का श्रेय जानकी लाल भांड (भीलवाड़ा) को दिया जाता है।
- जानकीलाल भांड को मंकीमेन भी कहते हैं।
- राजस्थान में प्रचलित प्रमुख स्वांग नाट्य : -1. बहरूपिया स्वांग - लोक चरित्र के अनुसार स्वांग धारण करना।2. भांड - दिखावटी स्वांग रचाता है।3. नारो/नाहर का स्वांग - भीलवाड़ा में चैत्र कृष्णा त्रयोदशी को वो किया जाता है।4. चौक च्वावणी - रामगढ़ (जैसलमेर) में गणेश चतुर्थी पर बच्चे करते हैं।5. भेंट के दंगल धौलपुर के प्रसिद्ध है।
- नौटंकी
- नौटंकी का शाब्दिक अर्थ नाटक का अभिनय करना है।
- नौटंकी का सर्वाधिक प्रचलन अलवर, भरतपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों में है।
- नौटंकी के नाटकों में 'रूप बसंत', नकाब पोश, सत्यवादी हरीशचन्द्र, राजा भर्तृहरि आदि मुख्य है।
- राजस्थान में नौटंकी का प्रचलन भूरेलाल (डीग, भरतपुर) ने किया।
- भरतपुर क्षेत्र में कृष्णाकुमारी की नौटंकी प्रसिद्ध है।
- नत्थाराम की मण्डली ने नौटंकी को भरतपुर और धौलपुर में प्रस्तुत किया।
- इसमें सारंगी, शहनाई व ढपली वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
- भरतपुर में हाथरस शैली में नौटंकी की जाती है।
- ढप्पाली ख्याल
- इस ख्याल का सर्वाधिक प्रचलन अलवर जिले में (बहरोड़ व मुण्डावर) है।
- इसमें ढोल, नगाड़ा शहनाई वाद्यों का प्रयोग किया जाता है।
- किशनगढ़ी ख्याल
- इस ख्याल को लोकप्रिय बनाने का श्रेय प्रसिद्ध खिलाड़ी बंशीधर शर्मा को दिया जाता है।
- यह ख्याल अजमेर जिले के किशनगढ़ एवं आस-पास के क्षेत्रों में प्रचलित है।
- अली बक्शी ख्याल
- यह ख्याल पूर्वी राजस्थान विशेष रूप से अलवर में लोकप्रिय एवं प्रचलन में है।
- इसके प्रवर्तक राव अली बक्स अलवर के मुण्डावर ठिकाने के मूल निवासी थे।
- कन्हैया ख्याल
- करौली, भरतपुर, सवाईमाधोपुर, धौलपुर तथा दौसा आदि क्षेत्रों में कन्हैया ख्याल रामायण - महाभारत के आख्यानों के प्रस्तुतीकरण के लिए प्रसिद्ध है।
- यह ख्याल मुख्य रूप से मीणा जाति में प्रचलित है।
- इस ख्याल में गुर्जर, मीणा, माली आदि जातियों के लोग खिलाड़ी होते हैं तथा नगाड़े, ढप, चीमटे व झाँझ आदि वाद्यों का प्रयोग किया जाता है।
- कन्हैया लोकगीत के प्रस्तुतीकरण में 'मेड़िया' पात्र की महत्व पूर्ण भूमिका होती है।
- 'मेड़िया' पात्र के नेतृत्व में अभ्यास किया जाता है, यह गीत गोल घेरे में खड़ा होकर गाता है।
- पंक्ति की समाप्ति पर लम्बी उल्टी मींड इसकी विशेषता होती है।
- ये दंगल मई-जून महीने में दिन में आयोजित होते है।
- कन्हैया ख्याल में 'कहन' कही जाती है।
- जयपुरी ख्याल
- जयपुरी ख्यालों में गुणीजन खाना के कलाकार हिस्सा लेते थे।
- इस शैली की मुख्य लोकप्रिय ख्याल जोगी-जोगन, कान-गुजरी, मियाँ बीबू, पठान, रसीली तम्बोलन है।
- राजस्थान के प्रयोगवादी नाटककार हमीदुल्ला ने 1981 ई. में "ख्याल भारमली" नामक कथ्य पर नयी शैली में एक नाटक लिखा, जो पूरे देश में प्रसिद्ध है।
- इस शैली की विशेषताएँ निम्न प्रकार है :-
- इसमें स्त्री पात्रों की भूमिका स्त्रियाँ ही निभाती है।
- इस ख्याल में नए प्रयोगों की महती सम्भावनाएँ है।
- यह शैली रूढ़ नहीं है, मुक्त व लचीली है।
- गीत, संगीत व नृत्य का सुन्दर मेल देखने को मिलता है।
- कुचामनी ख्याल
- इस ख्याल शैली के प्रवर्तक लच्छीराम थे।
- लच्छीराम ने 10 ख्यालों की रचना की, जिनमें-चाँद नीलगिरी, राव रिड़मल तथा मीरा मंगल प्रमुख है।
- लच्छीराम की स्वयं की एक नृत्य मण्डली थी, जिसका प्रयोग ये पेशेवर नृत्य के लिए करते थे।
- इस शैली में निम्न विशेषताएँ होती है।
- इसका रूप गीत-नाट्य जैसा होता है।
- इसमें लोकगीतों की प्रधानता है।
- लय के अनुसार ही नृत्य के कदमों की ताल बंधी है।
- इसे खुले मंच पर प्रस्तुत किया जाता है।
- इनमें पुरुष पात्र ही स्त्री चरित्र का अभिनय करते हैं।
- इस ख्याल में संगीत के लिए ढोल एवं शहनाई वादक आदि सहयोगी होते हैं।
- इसमें नर्तक ही गाने को गाते हैं।
- लच्छीराम स्वयं अच्छे नर्तक के साथ-साथ प्रसिद्ध लेखक भी थे।
- वर्तमान में इस ख्याल के प्रवर्तक उगमराज खिलाड़ी है।
- शेखावाटी ख्याल
- इस ख्याल के नानू राम (चिड़ावा, झुंझुनूं) एवं इनके शिष्य दुलिया राणा प्रसिद्ध कलाकार रहे है।
- नानू राम (चिड़ावा, झुंझुनूं) तथा उनके शिष्य दूलिया राणा ने इसे "चिड़ावी ख्याल" के रूप में लोक प्रिय बनाया।
- नानूराम ने हीर राझाँ, हरीशचन्द, भर्तृहरी, जयदेव कलाली, ढोला- मरवण, आल्हादेव आदि ख्यालों की रचना की।
- दूलिया राणा अपनी मृत्यु से पूर्व उपरोक्त सभी ख्यालों को अपने भतीजे के साथ खेला करते थे।
- इस ख्याल में स्त्री पात्र की भूमिका पुरुष के द्वारा निभाई जाती है
- इस ख्याल में दूलिया स्त्री चरित्रों की भूमिका बड़ी कुशलता से निभाते थे।
- दूलिया राणा के बाद इनके पुत्र सोहनलाल तथा पोते बन्सी बनारसी इस ख्याल के अखाड़े लगाते है।
- इस लोकनाट्य शैली की निम्न विशेषताएँ है :-1. अच्छा पद संचालन2. पूर्ण सम्प्रेषणीय शैली, भाषा और मुद्रा में गीत गायन3. वाद्यों की की उचित संगत, जिनमें प्रायः हारमोनियम, सांरगी, शहनाई, बाँसुरी नक्कारा तथा ढोलक का प्रयोग होता है।
- हेला ख्याल
- यह ख्याल दौसा, लालसोट तथा सवाईमाधोपुर आदि क्षेत्रों में प्रचलन में है।
- इस ख्याल में दंगल प्रतियोगिता संगीत के साथ शुरू होती है।
- इसमें नौबत वाद्य का प्रयोग होता है।
- इसकी मुख्य विशेषता 'हेला देना' (लम्बी टेर में आवाज देना) रही है।
- शायर हेला ने इस ख्याल को प्रसिद्ध बनाया।
- तुर्रा - कलंगी ख्याल
- इस ख्याल की रचना मेवाड़ के मुस्लिम संत शाह अली व हिन्दू संत तुकनगीर नामक दो संत पीरों ने 16 वीं शताब्दी में की।
- इसमें तुर्रा को महादेव 'शिव' तथा कलंगी को 'पार्वती' का प्रतीक माना जाता है।
- तुकनगीर 'तुर्रा' के पक्षकार थे, भगवा वस्त्र धारण करते थे।
- शाह अली 'कलंगी' के पक्षकार थे, हरे वस्त्र धारण करते थे।
- इन दोनों खिलाड़ियों ने 'तुर्रा कलंगी' के माध्यम से शिव-शक्ति के विचारों को लोक जीवन तक पहुँचाया।
- तुर्रा-कलंगी का ख्याल राजस्थान व मध्य प्रदेश में लोकप्रिय है, ख्यालों में सबसे पहले खेले गये ख्याल को "तुर्रा-कलंगी" के नाम से जानते है।
- इस ख्याल की मुख्य विशेषताएँ निम्न प्रकार है :-
- 1. इसकी प्रकृति गैर व्यावसायिक है।
- 2. इसमें रंग-मंच की भरपूर सजावट होती है। यह सजावट राजस्थानी शैली की होती है।
- 3. इसमें नृत्य की ताल सरल होती है।
- 4. लयात्मक गायन जो, कविता के बोल जैसा ही होता है।
- 5. यही एक ऐसा लोक-नाट्य है जिसमें दर्शकों के भाग लेने की सर्वाधिक संभावनाएँ मौजूद रहती है।
- 6. वर्तमान में नानालाल, गंधर्व इस कला के प्रसिद्ध कलाकार है।
- राजस्थान में सहदूसिंह (तुर्रा) व हमीद बेग (कलंगी) के नेतृत्व में चित्तौड़गढ़, घोसूंडी निम्बाहेड़ा में तुर्रा कलंगी ख्याल शुरू हुआ।
- 'तुर्रा-कलंगी' के मुख्य केन्द्र घोसुण्डी, चित्तौड़, निम्बाहेड़ा तथा नीमच है।
- इन्हीं स्थानों पर इसके सर्वश्रेष्ठ कलाकर चेतराम, हमीद बेग, ताराचन्द तथा ठाकुर ओंकार सिंह आदि है।
- वर्तमान में सोनी जयदयाल इसके लोकप्रिय कलाकार थे, जिनके ख्याल आज भी लोकप्रिय है।
- इस ख्याल को प्रस्तुत करने के लिए दो - मंच आमने-सामने निर्मित होते है। जिन पर दो खिलाड़ी आपसी संवाद को बोलते रहते है। इनके संवाद 'बोल' कहलाते है।
- तुर्रा- कलंगी की शैली को 'माच' कहते है।
- इसमें स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष ही निभाते है।
- इसमें चंग नामक वाद्य का प्रयोग किया जाता है।
- राजस्थान का वर्तमान शाहपुरा जिला की परंपरागत लोक चित्रकला "फड़" के कारण राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है।
- वर्ष 2006 में फड़ चित्रकार श्रीलाल जोशी पद्मश्री से नवाजे जा चुके है।
- श्रीलाल जोशी ने शाहपुरा की फड़ चित्रकला को वर्तमान में नई पहचान दी है।
- पाबूजी की फड़
- यह सबसे लोक प्रिय फड़ है।
- इस फड़ में मुख के सामने भाले का चित्र होता है तथा पाबूजी की घोड़ी केसर कालमी को काले रंग से चित्रित किया जाता है।
- इस फड़ का वाचन रात्रि में किया जाता है।
- पाबूजी की फड़ का वाचन नायक जाति के भोपे के द्वारा किया जाता है।
- इस फड़ का वाचन रावण हत्था वाद्य यंत्र का उपयोग किया जाता है।
- देवनारायण जी फड़
- यह सबसे पुरानी, सर्वाधिक चित्रांकन वाली, सबसे जी फड़ है।
- इसका वाचन रात में गुर्जर जाति के भोपों द्वारा किया जाता है।
- फड़ में मुख के सामने 'सर्प' का चित्र तथा देवनारायण जी की घोड़ी 'लीलण' को चित्रित किया जाता है।
- भारतीय डाक विभाग ने 2 सितम्बर, 1992 को देवनारायण जयन्ती के अवसर पर देवनारायण की फड़ पर, 2×2 डाक टिकट जारी किया।
- इस फड़ का वाचन जंतर वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
- देवनारायण जी की फड़ की प्रतिलिपि जर्मनी के संग्राहलय में सुशोभित है।
- रामदेव जी की फड़
- इस फड़ का चित्रण चौथमल चितेरे ने किया।
- इस फड़ का प्रचलन भाँभी, कोली, चमार तथा बलाइयों में है जो रामदेव जी के भक्त होते है।
- रामदेव जी की फड़ का वाचन रावणहत्था वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
- कामड जाति के भोपे द्वारा इस फड़ का वाचन किया जाता है।
- रामदला एवं कृष्णदला की फड़
- इस प्रकार की फड़ में किसी एक व्यक्ति की सम्पूर्ण गाथा न होकर जगत् के लेखे-जोखे का चित्रण किया जाता है।
- राम और कृष्ण के जीवन की प्रमुख घटनाओं का चित्रण किया जाता है।
- इस प्रकार की फड़ सर्वप्रथम धूलजी द्वारा निर्मित की गई है।
- इसे भाट जाति के भोपे हाड़ौती क्षेत्र में सर्वाधिक गाते हैं।
- इसमें किसी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं होता है।
- इसका वाचन दिन में होता है।
- भेंसासुर की फड़
- भैंसासुर की फड़ बावरी या बागरी जाति के लोग रखते हैं।
- जब ये लोग चोरी करने निकलते हैं तब इसकी पूजा कर शकुन लेते हैं।
- इस फड़ का वाचन नहीं किया जाता है।
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