राजस्थान के चौहान वंश का इतिहास | Chauhan Dynasty of Rajasthan | Rajasthan History for RSSB CET Exam
राजस्थान CET स्नातक स्तर परीक्षा से संबंधित राजस्थान के चौहान वंश का इतिहास/Chauhan Dynasty of Rajasthanr के बारे में विस्तृत विवरण -
- बिजौलिया शिलालेख के अनुसार सांभर झील का प्रवर्तक वासुदेव चौहानों का मूलपुरुष था।
- चौहान वंश की स्थापना 551 ई. में हुई।
- चौहान वंश का मूल स्थान सपादलक्ष (सांभर) था और उनकी राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) थी।
- डॉ. दशरथ शर्मा ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर चौहानों को ब्राह्मण बताया।
- पृथ्वीराज रासो, नैणसी, सूर्यमल्ल मीसण आदि चौहानों की उत्पति वशिष्ठ ऋषि द्वारा आबू के अग्निकुण्ड से मानते है।
- कायमखां रासो और चन्द्रावती के शिलालेख के आधर पर चौहानों को ब्राह्मणवंशीय माना गया है।
- वाक्पतिराज चौहानों का शक्तिशाली शासक हुआ, जिसने प्रतिहारों को परास्त कर अपनी शक्ति का परिचय दिया।
- 983 ई. का हर्षनाथ लेख विग्रहराज द्वितीय की विजयों का उल्लेख करता है, विग्रहराज द्वितीय ने गुजरात के चालुक्य शासक मूलराज को परास्त किया था।
- विग्रहराज द्वितीय के बाद दुर्लभराज और गोविन्द तृतीय शासक हुये।
- पृथ्वीराज विजय ग्रन्थ में गोविन्द तृतीय की उपाधि "वैरिघट्ट" मिलती है।
- अजयराज
- अजयराज के द्वारा 1113 ई. में अजमेर नगर बसाया गया।
- अजयराज के द्वारा चाँदी और तांबे के सिक्के चलाये गये, जिन्हें अजयप्रिय द्रम्म कहा गया।
- सिक्को पर अजयराज की पत्नी सोमलदेवी का नाम भी मिलता है।
- दिगम्बरों एवं श्वेताम्बरों के शास्त्रार्थ की अध्यक्षता की गई।
- पाशर्वनाथ मंदिर के लिए एक स्वर्ण कलश भी प्रदान किया गया।
- अर्नोराज ने अजमेर में आनासागर झील एवं पुष्कर में वराह मंदिर बनवाया।
- अर्नोराज की हत्या पुत्र जग्ग्देव के द्वारा 1155 ई. में की गई।
- विग्रहराज चतुर्थ
- विग्रहराज चतुर्थ (1158 - 63) तोमरों को पराजित कर दिल्ली पर अधिकार किया।
- विग्रहराज चतुर्थ दिल्ली पर अधिकार करने वाला प्रथम चौहान शासक था।
- विग्रहराज चतुर्थ ने हरिकेली और उसके दरबारी विद्वान सोमदेव ने ललित विग्रहराज नाटक की रचना की।
- जयानक भट्ट ने विग्रहराज चतुर्थ को कवि बान्धव की उपाधि प्रदान की।
- विग्रहराज चतुर्थ ने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला बनवाकर उस पर हरिकेली नाटक की पंक्तियाँ खुदवाई।
- कुतुबद्दीन ऐबक ने संस्कृत पाठशाला को तुड़वाकर वहां "ढाई दिन का झोंपड़ा" मस्जिद बनवाई।
- विग्रहराज चतुर्थ ने बीसलपुर बसाकर वहाँ बीसलपुर झील बनवाई।
- धर्मघोष सूरी के आदेश से एकादशी के दिन पशुवध पर अंकुश लगाया।
- विग्रहराज चतुर्थ का उतराधिकारी अपरगांग्य एवं इसके बाद पृथ्वीराज द्वितीय शासक बना।
- पृथ्वीराज द्वितीय का उतराधिकारी उसका चाचा सोमेश्वर था।
- पृथ्वीराज तृतीय
- शाकम्भरी के चौहानों में सबसे प्रसिद्ध पृथ्वीराज तृतीय 11 वर्ष की आयु में शासक बना।
- पृथ्वीराज तृतीय के पिता का नाम सोमेश्वर एवं माता का नाम कर्पूरदेवी था।
- पृथ्वीराज तृतीय ने कन्नोज के गहडवाल शासक जयचंद की पुत्री संयोगिता से विवाह किया
- पृथ्वीराज तृतीय ने तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में गजनी के शासक मुहम्मद गौरी को पराजित कर दिया था।
- पृथ्वीराज तृतीय को तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में मुहम्मद गौरी से पराजित होना पड़ा।
- 1182 ई. में महोबा के चंदेल शासक परमर्दिदेव को पराजित किया, जिसमे प्रसिद्ध वीर "आल्हा ऊदल" लड़ते हुये मारे गये।
- पृथ्वीराज ने दिल्ली में पिथौरागढ़ का निर्माण करवाया था।
- पृथ्वीराज विजय के रचयिता जयानक एवं पृथ्वीराज रासो के लेखक चन्दबरदाई थे।
- रणथम्भौर में चौहान वंश
- रणथम्भौर में चौहान वंश का संस्थापक पृथ्वीराज तृतीय का पुत्र गोविन्दराज (1194 ई.) था।
- रणथम्भौर के चौहान वंश का प्रतापी शासक हम्मीर देव चौहान (1282 - 1301) था।
- 1291 ई. में जलालुद्दीन खलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया, लेकिन सफलता प्राप्त नही हो सकी।
- हम्मीर द्वारा मंगोल विद्रोहियों को शरण देने के कारण दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का सामना करना पड़ा, हम्मीर ने तुर्क सेना को पराजित कर दिया।
- 1301 ई. में अलाउद्दीन स्वयं सेना के साथ आकर रणथम्भौर पर आक्रमण किया।
- अलाउद्दीन ने हम्मीर के सेनानायक रणमल और रतिपाल को लालच देकर रणथम्भौर किले पर अधिकार कर लिया।
- युद्ध में हम्मीर लड़ता हुआ मारा गया और पत्नी रंगादेवी के नेतृत्व में महिलाओं ने जौहर किया।
- राजस्थान का प्रथम साका/जौहर रणथम्भौर के चौहान वंश के द्वारा किया गया।
- अलाउद्दीन ने रणथम्भौर जीतकर उलूग खां को प्रशासक नियुक्त कर दिया।
- हम्मीर महाकाव्य नयनचंद सूरी के द्वारा लिखा गया ग्रन्थ है।
- हम्मीर को 16 युद्धों का विजेता मना जाता है।
- हम्मीर देव ने पिता जेत्रसिंह के 32 वर्षो के शासनकाल की स्मृति में बत्तीस खम्भों की छतरी का निर्माण करवाया गया था।
- हम्मीर देव की मृत्यु के बाद चौहानों की रणथम्भौर शाखा समाप्त हो गई।
- जोधराज के हम्मीर रासो और चंद्रशेखर के हम्मीर हठ ग्रंथो से हम्मीर के शोर्य की जानकारी मिलती है।
- जालौर का चौहान वंश
- 1181 ई. में जालौर के चौहान वंश की स्थापना कीर्तिपाल के द्वारा की गई थी।
- बिजौलिया प्रशस्ति में जालौर को जाबालिपुर कहा गया है।
- जालौर के किले को सुवर्णगिरी, सोनगढ़ और कांचनगिरी भी कहा जाता है।
- कीर्तिपाल का उतराधिकारी समरसिंह था।
- समरसिंह ने जालौर में सुदृढ़ प्राचीर,कोषागार, और शस्त्रागार का निर्माण करवाया।
- कान्हडदेव जालौर के चौहान शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था।
- 1308 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर के सिवाना पर अधिकार कर लिया और खैराबाद नाम रख दिया।
- 1311 ई. में कान्हड़देव के दहिया सरदार का बीका के विश्वासघात के कारण अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
- युद्ध में लड़ते हुये कान्हड़देव मारा गया और महिलाओ के द्वारा जौहर किया गया।
- अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर जीतकर उसका नाम जलालाबाद कर दिया।
- अलाउद्दीन खिलजी ने अलाई/तोपखाने की मस्जिद का निर्माण करवाया।
- पद्मनाभ के द्वारा कान्हडदे प्रबंध की रचना की गई।
- सिरोही का चौहान वंश
- सिरोही के अखयराज देवड़ा ने 1527 ई. में खानवा के युद्ध में राणा सांगा का साथ दिया।
- सिरोही के चौहान वंश का संस्थापक राव लुम्बा जालौर की देवड़ा शाखा से संबंधित था।
- 1311 ई. में परमारों से आबू और चन्द्रावती छिनकर सिरोही में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
- राव लुम्बा ने अचलेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।
- रायमल के पुत्र भिमान ने सरणवा पहाड़ो पर दुर्ग की स्थापना की और 1405 ई. में शिवपुरी नामक नगर बसाया।
- सुरतान देवड़ा ने 1575 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की।
- सिरोही के शिवसिंह ने 11 सितम्बर, 1823 में अंग्रेजों से संधि की।
- भिमान के उतराधिकारी सहसमल ने 1425 ई. में सिरोही बसाकर राजधानी बनायी।
- राणा कुम्भा ने सहसमल को पराजित कर अचलगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया।
- सहसमल का उतराधिकारी लाखा के द्वारा पावागढ़ से कालिका की मूर्ति लाकर सिरोही में स्थापित की और लाखनाव तालाब का निर्माण करवाया।
- हाड़ौती का चौहान वंश
- चौहान वंशीय देवा हाडा ने मीणाओं को पराजित कर 1241 ई. में बूंदी राज्य की स्थापना की।
- कुम्भाकालिन रणकपुर लेख में बूंदी का नाम वृंदावती मिलता है।
- देवा के उत्तराधिकारी समरसिंह हाडा ने 1264 ई. में कोटिया शाखा के भीलों को पराजित कर कोटा पर अधिकार किया और अपने पुत्र जेत्रसिंह दिया।
- जैत्रसिंह हाडा ने कोटा के किले का निर्माण करवाया एवं गुलाब महल का भी निर्माण करवाया।
- बूंदी के बरसिंह हाडा ने 1354 ई. में बूंदी के तारागढ़ किले का निर्माण करवाया गया।
- तारागढ़ का किला भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
- सुर्जन हाडा (1554-85)
- सुर्जन हाडा के शासनकाल से पूर्व बूंदी के शासक मेवाड़ के अधीन आते थे।
- 1569 ई. में अकबर के द्वारा रणथम्भौर पर आक्रमण के दौरान सुर्जन हाडा ने मुगल अधीनता स्वीकार कर ली।
- अकबर के द्वारा सुर्जन हाडा को रावराजा की उपाधि एवं पांच हजार का मनसब दिया गया।
- बूंदी के निकट 26 और बनारस के निकट 26 परगने जागीर के रूप में दिए गये।
- बनारस में सुर्जन हाडा द्वारा जलाशये, महल और गंगा नदी के तट पर घाट बनवाये गये।
- द्वारिकापुरी में सुर्जन हाडा द्वारा रणछोड़जी का मंदिर बनवाया गया।
- बनारस में ही सुर्जन हाडा की मृत्यु हो गई।
- राव रतनसिंह
- राव रतनसिंह को जहांगीर के द्वारा न्यायप्रिय होने के कारण रामराज और चित्रकला प्रेमी होने कारण सरबुलंदराय की उपाधि दी।
- जहाँगीर के द्वारा 5000 का मनसब भी दिया गया।
- राव रतनसिंह ने खुर्रम का विद्रोह दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- राव रतनसिंह अपने लडके गोपीनाथ की हत्या करने वाले ब्राह्मणों को दण्ड नही दिया, क्योंकि वह दुराचारी था।
- राव शत्रुशाल
- शाहजहाँ ने राव शत्रुशाल को राव की पदवी, तीन हजार जात और दो हजार का मनसब दिया।
- मुगल उत्तराधिकार युद्ध में शाहजादे दारा के पक्ष में युद्ध करते हुये सामुगढ़ में गोली लगने से वीरगति को प्राप्त हुआ।
- शत्रुशाल की स्मृति में पुत्र अनिरुद्ध हाडा ने 1683 ई. में बूंदी में चौरासी खंभों की छतरी का निर्माण करवाया।
- अनिरुद्ध की पत्नी रानी नाथावती के द्वारा रानीजी की बावड़ी का निर्माण करवाया गया।
- अनिरुद्ध का पुत्र जोधसिंह हाडा 1706 ई. में बूंदी के जेतसागर तालाब में गणगौर के अवसर पर नाव की सवारी करते समय अपनी पत्नियों और गणगौर की प्रतिमा सहित डूब गया, तभी से "हाड़ो ले डुब्यो गणगौर" विख्यात हो गया।
- बहादुरशाह ने राव बुध्द्सिंह को महाराव राणा का खिताब और परगने जागीर में दिए।
- उम्मेद सिंह
- उम्मेद सिंह ने कोटा के शासक और मल्हराव होल्कर की सहायता से बूंदी की गद्दी प्राप्त की।
- उम्मेद सिंह मल्हराव होल्कर को मामा कहता था।
- उम्मेद सिंह श्री जी के नाम से जाना जाता था।
- उम्मेद सिंह ने बूंदी के तारागढ़ किले में चित्रशाला का निर्माण करवाया।
- उम्मेद सिंह ने जीवनकाल में स्वयं की सोने की मूर्ति बनवाकर अंतिम संस्कार करवाया था।
- बूंदी के शासक विष्णुसिंह हाडा ने 10 फरवरी, 1818 को अंग्रेजों से संधि की।
- 1857 ई. की क्रांति के दौरान बूंदी शासक रामसिंह हाडा ने अंग्रेजों का सहयोग नही किया था।
- बूंदी शासक रामसिंह के शासनकाल में ठाकुर बलवंतसिंह जयपुर से तीज की प्रतिमा बूंदी लाये थे।
- रामसिंह के समय प्रसिद्ध कवि सूर्यमल्ल मीसण ने वंश भास्कर की रचना की।
- बूंदी का अंतिम शासक बहादुर सिंह था।
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