Sunday, September 01, 2024

मारवाड़ का राठौड़ वंश का इतिहास | Rathore Dynasty of Marwar | Rajasthan History for RSSB CET Exam

मारवाड़ का राठौड़ वंश का इतिहास | Rathore Dynasty of Marwar | Rajasthan History for RSSB CET Exam

राजस्थान CET स्नातक स्तर परीक्षा से संबंधित मारवाड़ का राठौड़ वंश का इतिहास/Rathore Dynasty of Marwar के बारे में विस्तृत विवरण - 

  • जोधपुर के राठौड़ो का मूलपुरुष सीहा था।
  • कन्नोज के गहडवाल जयचंद का वंशज माना जाता है।
  • सीहा सेतराम का पुत्र था।
  • सीहा केवल मारवाड़ के एक छोटे से भाग पाली से उत्तर पश्चिम में अपना राज्य स्थापित कर पाया था।
  • बीठू गाँव (पाली के पास) से मिले लेख के अनुसार 1273 ई. में सिंध के मुस्लिम लुटेरो से लड़ते हुये राव सीहा ने वीरगति प्राप्त की।

  • आस्थान
    • आस्थान राव सीहा का पुत्र था।
    • जलालुद्दीन खिलजी की सेना पाली पर आक्रमण के दौरान आस्थान पाली की रक्षा करता हुआ 1291 ई. में वीरगति को प्राप्त हुआ।
  • धूहड
    • आस्थान का उतराधिकारी था।
    • धूहड ने प्रतिहारों को परास्त कर के मण्डोर पर अधिकार किया।

  • रायपाल धूहड का बड़ा पुत्र था।

  • राव चून्डा 
    • राव चून्डा ने अपने साहस और कूटनीति से मण्डोर पर अधिकार कर लिया।
    • राव चून्डा ने मण्डोर को राजधानी बनाई।
    • राव चून्डा ने खाटू, डीडवाना, सांभर, अजमेर, नाडोल आदि पर भी अधिकार कर लिया था।
    • राव चून्डा ने नागौर के पास चून्डासर तालाब बनवाया।
    • राव चून्डा की पत्नी ने चाँद कँवर ने "चाँद बावड़ी (जोधपुर)" का निर्माण करवाया।
    • पुंगल के भाटियों द्वारा धोखे से 1423 ई. में मारा गया।

  • राव जोधा 
    • राव जोधा मारवाड़ के रणमल का पुत्र था
    • राव जोधा ने 1459 ई. में जोधपुर नगर बसाया और राजधानी बनायी
    • राव जोधा ने चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ दुर्ग बनवाया
    • राव जोधा ने किले के भीतर नागनेची माता का मंदिर बनवाया
    • राव जोधा की पत्नी जसमादे ने जोधपुर में राणीसर तालाब बनवाया

  • राव मालदेव
    • राव मा​लदेव, राव गांगा का पुत्र था
    • राव मा​लदेव  ने खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से भाग लिया
    • 1536 ई. में जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री "उमादे" से विवाह किया, जो इतिहस में "रूठी रानी" के नाम से प्रसिद्ध हुई
    • 1543-44 ई. में राव मा​लदेव को शेरशाह सूरी के विरुद्ध युद्ध लड़ना पड़ा
    • राव मा​लदेव के सेनापति जेता और कूंपा ने जनवरी, 1544 में गिरी सुमेल में शेरशाह से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हो गये
    • शेरशाह की मृत्यु के बाद मालदेव ने पुन जोधपुर और आसपास के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया
    • 1557 ई. में "हरमाड़ा" के युद्ध में राव मा​लदेव ने मेवाड़ के शासक राणा उदयसिंह को परास्त किया
    • अबुल फजल और निजामुद्दीन ने राव मालदेव की प्रशंसा करते हुये उसे "हशमत वाला राजा" कहा है
    • राव मालदेव ने जोधपुर गढ़ के कोट के साथ राणीसर कोट और शहरपनाह बनवाया
    • अजमेर के तारागढ़ दुर्ग में पानी व्यवस्था करवाई। 

  • राव चन्द्रसेन
    • राव चन्द्रसेन, राव मालदेव का पुत्र था
    • राव चन्द्रसेन को अपने बड़े भाइयों राम और उदयसिंह के विरोध का सामना करना पड़ा
    • अकबर ने हुसैन कुली खां के नेतृत्व में सेना भेजकर जोधपुर पर अधिकार कर लिया
    • चंद्रसेन ने भाद्राजूण और सिवाना में रहकर मुगल सेना का सामना किया और मुगलों से अधीनता स्वीकार नही की
    • पहाड़ो में भटकते हुये 11 जनवरी, 1581 को राव चंद्रसेन का देहांत हो गया
    • विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने जोधपुर के राव चंद्रसेन की तुलना महाराणा प्रताप से की

  •  मोटा राजा उदयसिंह
    • 1583 ई. में अकबर ने मोटा राजा उदयसिंह को मुगल अधीनता में जोधपुर का शासक नियुक्त किया
    • मोटा राजा उदयसिंह राव चंद्रसेन का भाई था
    • मोटा राजा उदयसिंह ने 1587 ई. में अपनी पुत्री जोधा बाई (जगत गुसाई) का विवाह जंहागीर के साथ कर दिया
    • उदय सिंह के पुत्र किशनसिंह ने 1609 ई. में किशनगढ़ बसाकर उसे राठौड़ सत्ता का तीसरा केंद्र बनाया गया

  • राव सूरसिंह
    • अकबर ने सूरसिंह को सावी राजा की उपाधि दी।
    • जंहागीर ने सूरसिंह को 5000 का मनसब प्रदान किया।

  • महाराजा गजसिंह
    • जंहागीर  ने गजसिंह को तीन हजार जात और दो हजार सवार के मनसब, झंडा और राजा की उपाधि से सम्मानित किया।
    • बीजापुर और कंधार अभियानों में अपनी वीरता का परिचय दिया।
    • जंहागीर ने 1621 ई. में गजसिंह को "दलथम्मन" की उपाधि दी।
    • गजसिंह ने अपनी प्रेमिका अनारा बेगम के प्रभाव में आकर छोटे पुत्र जसवंतसिंह को अपना उतराधिकारी बनाया।
    • 1638 ई. में गजसिंह की मृत्यु आगरा में हुई।
    • गजसिंह के बड़े पुत्र अमरसिंह को शाहजहाँ ने नागौर परगना प्रदान किया।

  • जसवंतसिंह प्रथम 
    • महाराजा जसवंत सिंह का जन्म 26 दिसंबर, 1626 को बुरहानपुर में हुआ
    • शाहजहाँ द्वारा टीका और खिलअत दी गई, साथ ही राजा का खिताब और 6000 जात एवं 6000 सवार का मनसब भी दिया गया
    • 1640 ई. में जोधपुर पहुचने पर गद्दीनशीनी का उत्सव मनाया गया
    • उतराधिकारी युद्ध (1657 -58) में ओरंगजेब के विरुद्ध धर्मत के युद्ध में दारा का साथ दिया
    • मुहणौत नैणसी मारवाड़ के जसवंतसिंह प्रथम के दरबार मे मंत्री था।
    • जसवंतसिंह प्रथम के समय सूरत मिश्र, न्रहरिदास, नवीन कवि एवं बनारसी दास आदि प्रसिद्ध विद्वान् थे।
    • जसवंत सिंह की पत्नी अतीरंगदे ने जोधपुर में जानसागर तालाब का निर्माण करवाया, जिसे शेखावात जी का तालाब कहा जाता है।
    • दूसरी पत्नी जसवंतदे ने जोधपुर में राइका बाग और कल्याण सागर का निर्माण करवाया, जिसे वर्तमान में रातानाडा कहा जाता है

  • अजीत सिंह
    • जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद 1679 में लाहौर में अजीत सिंह का जन्म हुआ।
    • अजीत सिंह का लालन पोषण गौरा धाय ने किया, जिसको मारवाड़ की पन्नाधाय कहा जाता है।
    • जोधपुर में फतहमहल मूलनायक एवं घनश्याम मंदिर का निर्माण करवाया।
    • दुर्गा पथ, भाषा और गुणसागर नामक ग्रन्थ लिखे।

  • अभय सिंह
    • अअभय सिंह के शासनकाल में हकीम गिरधारी दास ने खेजड़ली में पेड़ कटवाने के आदेश दिए
    • 28 अगस्त, 1730 को अमृता देवी के नेतृत्व में 363 स्त्री-पुरुष मारे गए, इस घटना को "खेजड़ली आंदोलन" के नाम से जाना जाता है
    • "खेजड़ली आंदोलन" की स्मृति में खेजड़ली में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को विश्व का एकमात्र "वृक्ष मेला" आयोजित किया जाता है
    • अभय सिंह के शासन काल में जोधपुर में पेड़ो को बचाने के लिए 28 अगस्त, 1730 को अमृतादेवी के नेतृत्व में 363 स्त्री-पुरुष मारे गये, इस घटना को "खेजडली आन्दोलन" के नाम से जाना जाता है।

  • विजयसिंह 
    • विजय सिंह ने 1781 ईस्वी में मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय से मारवाड़ में टकसाल खोलने की अनुमति प्रदान प्राप्त की और अपने नाम से विजयशाही सिक्के चलाए
    • विजय सिंह पर पासवान गुलाबराय का अत्यधिक प्रभाव था,
    • वीर विनोद में श्यामलदास ने इसे जहांगीर का नमूना और गुलाब राय को जोधपुर का नूरजहाँ कहा है।

  • मानसिंह 
    • जयपुर के शासक जगत सिंह के साथ 13मार्च, 1807 में "गिंगोली का युद्ध " हुआ।
    • जोधपुर में नाथ सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ "महामंदिर" का निर्माण करवाया।
    • जोधपुर में मान पुस्तकालय की स्थापना करवाई।
    • 6 जनवरी, 1818 में अंग्रेजों से संधि कर उनकी अधीनता स्वीकार कर ली।
    • मानसिंह के शासन काल में अंग्रेजों ने 1835 ई. में ऐरनपुरा में "जोधपुर लीजन" का गठन किया गया।

  • महाराजा तख्तसिंह (1843-73)
    • 1843 ई. में अंग्रेज सरकार के समक्ष "अमरकोट" पर दावा पेश किया
    • 1857 ई. की क्रांति के समय जोधपुर शासक महाराजा तख्तसिंह था
    • 1857 ई. की क्रांति के समय महाराजा ने अंग्रेजों की सहायता की
    • 1870 ई. में लार्ड मेयो के दरबार में भाग नही लेने पर महाराजा की सलामी की तोपों की संख्या कम कर दी गयी

  • ​जसवंतसिंह द्वितीय
    • जसवंतसिंह द्वितीय के द्वारा दिसम्बर, 1875 के कलकता एवं 1877 ई. के दिल्ली दरबार में भाग लिया।
    • जसवंतसिंह द्वितीय के काल में वर्ष 1883 में स्वामी दयानन्द सरस्वती जोधपुर आये थे
    • जसवंतसिंह द्वितीय के काल में जोधपुर में आर्य समाज की स्थापना हुई थी।
    • जसवंतसिंह द्वितीय के काल में ही जोधपुर में बाल विवाह पर प्रतिबन्ध लगाया गया।
    • महारानी विक्टोरिया के स्वर्ण जुबली उत्सव में भाग लेने के लिए 1887 ई. में प्रतापसिंह को मारवाड़ के प्रतिनधि के रूप इंग्लेंड भेजा

  • सरदार सिंह
    • चीन के बोक्सर युद्ध को दबाने के लिए मारवाड़ी सेना अंग्रेजों की सहायतार्थ भेजी
    • सरदार सिंह ने जसवंतसिंह द्वितीय की स्मृति में "जसवंत थड़ा" का निर्माण करवाया, जिसे राजस्थान का ताजमहल कहा जाता है।
    • इसने 1910 ई. में 29000 रु.वार्षिक मंजूर कर "एडवर्ड रिलीफ फंड" बनाया, जिससे असमर्थ लोगों को पेंशन दी जाती थी।

  • उम्मेद सिंह
    • उम्मेद सिंह के द्वारा 18 नवम्बर, 1929 को जोधपुर में "छितर पैलेस" (उम्मेद पैलेस) की नींव रखी गई।
    • उम्मेद सिंह ने गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए राज्य प्रतिनिधि के रूप में जे. डब्ल्यू, यंग को भेजा।
    • जयनारायण व्यास को मारवाड़ की ओर से संविधान सभा का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया।

  • हनुवंत सिंह
    • जोधपुर के राठौड़ वंश का अंतिम शासक था।
    • हनुवंत सिंह ने 9 अगस्त, 1947 को भारतीय संघ अधिनियम पर हस्ताक्षर किये

राजस्थान का कच्छवाह वंश का इतिहास | Kachwaha Dynasty of Amer (Jaipur)

राजस्थान CET स्नातक स्तर परीक्षा से संबंधित 1857 ई. की क्रांति के बारे में विस्तृत विवरण

  • राजस्थान का कच्छवाह वंश का इतिहास | Kachwaha Dynasty of Amer (Jaipur)

  • 1137 ई. में दूल्हराय ने दौसा के बडगुर्जरों को परास्त कर ढूंढाड़ में कच्छवाह वंश का नवीन राज्य स्थापित किया था।
  • सूर्यमल मिसण के अनुसार कूर्म नामक रघुवंशी शासक की संतति होने से ये कूर्मवंशीय कहलाने लगे।
  • डॉ. ओझा के अनुसार इनका मूलपुरुष कच्छवाहा था।
  • दूल्हराय ने ही जमवारामगढ़ में मीणों को परास्त कर अपनी राजधानी बनाया था।
  • कच्छवाह वंश की प्रथम राजधानी दौसा, दूसरी जमवारामगढ़, तीसरी आमेर और चौथी राजधानी जयपुर रही थी।
  • कच्छवाह वंश के नरु से नरुका और शेखा से शेखावत शाखाएँ निकली थी, जिस भाग शेखा ने राज्य स्थापित किया, शेखावाटी नाम से प्रसिद्ध हुआ।
  • कच्छवाह वंश के शासक राजदेव ने 1237 ई. में आमेर में प्रसिद्ध कदमी महलों का निर्माण करवाया, जिनमें बनी छतरी में कच्छवाह शासको का राजतिलक होता था।
  • चंद्रसेन का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज 1527 ई. में खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की ओर से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ था।
  • 1207 ई. में काकिलदेव ने आमेर में मीणों को परास्त कर आमेर को कच्छवाहा वंश की राजधानी स्थापित की।

  • धुल्हेराय
    • 1137 ई. में दूल्हराय ने दौसा के बडगुर्जरों को परास्त कर ढूंढाड़ में कच्छवाह वंश का नवीन राज्य स्थापित किया था।
    • दूल्हराय ने ही जमवारामगढ़ में मीणों को परास्त कर अपनी राजधानी बनाया था।

  • 1207 ई. में काकिलदेव ने आमेर में मीणों को परास्त कर आमेर को कच्छवाहा वंश की राजधानी स्थापित की।

  • भारमल
    • भारमल मुगल अधीनता स्वीकार करने वाला पहला राजपूत शासक था
    • मजनू खां ने दिसंबर, 1556 में अकबर और भारमल की मित्रता कार्रवाई
    • 20 जनवरी 1562 में सांभर में ही अपने पुत्र भगवान दास और पौत्र मानसिंह सहित भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली
    • जनवरी, 1562 में अजमेर से लौटते समय सांभर में भारमल ने पुत्री हरकूबाई या मानमती का विवाह अकबर के साथ किया
    • जहांगीर हरकू भाई का पुत्र था, इस कारण भारमल मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाला पहला राजपूत शासक था
    • अकबर ने भारमल को 5000 का मनसब एवं अमीर उल उमरा उपाधि प्रदान की थी

  • भगवंतदास
    • भगवंतदास भारमल का पुत्र था
    • अकबर ने भगवंतदास को टीका भिजवाया और 5000 का मनसब एवं अमीर उल उमरा की पदवी दी
    • भगवंतदास ने पुत्री मानबाई का विवाह जहांगीर के साथ किया, खुसरो मानबाई से उत्पन्न जहांगीर का पुत्र था
    • 1583 से 1598 ई तक पंजाब के सूबेदार के रूप में कार्य किया
    • 1589 ई. में लाहौर में भगवंतदास की मृत्यु हुई

  • मानसिंह
    • मानसिंह अकबर के नवरत्नों में शामिल था
    • अकबर ने मानसिंह को फर्जन्द की उपाधि व 7000 का मनसब दिया
    • मानसिंह ने काबुल, बंगाल, बिहार आदि के सूबेदार के रूप में कार्य किया
    • मानसिंह ने बिहार में मानपुर और बंगाल में अकबरपुर/राजमहल की स्थापना की और रोहतासगढ़ में सुंदर महलों का निर्माण करवाया
    • मानसिंह ने बंगाल के शासक केदारनाथ को परास्त करके बंगाल से शीलादेवी की मूर्ति लाकर, उसे आमेर में प्रतिष्ठित करवाया
    • मानसिंह के पुत्र जगत सिंह की बंगाल अभियान के दौरान मृत्यु होने पर उसकी माता कनकावती ने जगत सिंह की स्मृति में आमेर में जगत शिरोमणि मंदिर का निर्माण करवाया, मूर्ति मानसिंह चित्तौड़ के मीरा मंदिर से लाए थे
    • मानसिंह के द्वारा अकबर एवं जहांगीर मुगल सम्राटों की सेवा की गई
    • अकबर के रणथम्भोर अभियान में सुरजन हाड़ा को मुगल अधीनता स्वीकार करवाने में मानसिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई
    • 1573 ई. में मानसिंह महाराणा प्रताप के पास मुगलों से संधि करने का दूसरा प्रस्ताव लेकर गए
    • मानसिंह की मृत्यु 6 जुलाई 1614 में इलिचपुर में हुई

  • मिर्जा राजा जयसिंह
    • राजा जयसिंह प्रथम को तीन मुगल सम्राट जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब की सेवा में रहने का अवसर प्राप्त हुआ
    • शाहजहां ने जयसिंह प्रथम को मिर्जा राजा की पदवी देकर शुजा के साथ कंधार भेजा
    • शिवाजी और जयसिंह प्रथम के मध्य संधि को पुरंदर की संधि (1665 ई.) के नाम से जाना जाता है
    • जयसिंह प्रथम के दरबार में प्रसिद्ध बिहारी कवि था, जयसिंह के द्वारा उसके एक-एक दोहे पर एक-एक स्वर्ण मुद्रा प्रदान की
    • 2 जुलाई 1667 को बुरहानपुर में सवाई जयसिंह की मृत्यु हो गई

  • सवाई जयसिंह द्वितीय
    • जयसिंह प्रथम की तुलना में जयसिंह द्वितीय की वीरता और वाक्पटुता के कारण औरंगजेब ने सवाई जयसिंह नाम रख दिया
    • 1707 ई के उत्तराधिकार युद्ध में जयसिंह ने आजम का पक्ष लिया, लेकिन युद्ध में मुअज्जम ने विजय प्राप्त की
    • मुअज्जम जो बहादुरशाह के नाम से शासक बना, आमेर पहुंचकर विजयसिंह को शासक घोषित कर दिया और आमेर का नाम इस्लामाबाद या मोमीनाबाद रख दिया
    • 1725 ईस्वी में सवाई जयसिंह ने नक्षत्रो की शुद्ध सारणी बनवाई और इसका नाम जीज मोहम्मदशाही रखा
    • सवाई जयसिंह के द्वारा जयसिंह कारिका नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की गई
    • सवाई जयसिंह ने जयपुर, दिल्ली, मथुरा, उज्जैन और बनारस में वेधशालाएं बनवाई, जयपुर का जंतर मंतर सबसे बड़ा है
    • जयसिंह ने विद्याधर नामक बंगाली वास्तुशास्त्र के ज्ञाता से एक नगर का नक्शा बनवाकर 18 नवम्बर, 1727 को जयपुर नगर की स्थापना करवाई गई।
    • सवाई जयसिंह अंतिम हिंदू शासक था, जिसने अश्वमेध यज्ञ संपन्न करवाएं
    • 1734 ईस्वी में सवाई जयसिंह ने जयपुर में नाहरगढ़ या सुदर्शन गढ़ किले का निर्माण करवाया
    • सवाई जयसिंह ने जयगढ़ में जयबाण तोप का निर्माण करवाया, जो एशिया की सबसे बड़ी तोप मानी जाती है
    • सवाई जयसिंह ने चंद्रमहल, सिसोदिया रानी का महल व जलमहल का निर्माण करवाया

  • ईश्वरीसिंह
    • ईश्वरीसिंह सवाई जयसिंह का ज्येष्ठ पुत्र था
    • टोंक के राजमहल के युद्ध में जयपुर की राजगद्दी को लेकर उसके सौतेले भाई माधोसिंह के साथ इसका संघर्ष हुआ
    • टोंक के राजमहल युद्ध में विजय के उपलक्ष में ईश्वरलाट का निर्माण करवाया गया
    • मराठौ की सहायता से माधव सिंह ने बगरू के युद्ध (1748 ई.) में ईश्वरीसिंह को परास्त कर दिया
    • होल्कर का जयपुर पर दबाव बढ़ने पर ईश्वरीसिंह ने 1750 ई. में आत्महत्या कर ली

  • माधोसिंह प्रथम
    • सवाई माधोसिंह प्रथम मेवाड़ राजकुमारी चंद्रकुंअरी एवं सवाई जयसिंह का पुत्र था
    • 1761 ई. में भटवारा के युद्ध  में कोटा के शासक शत्रुसाल से परास्त हुआ
    • 1763 ई. में सवाई माधोसिंह प्रथम ने सवाई माधोपुर की स्थापना की
    • चाकसू में शीतला माता मंदिर का निर्माण करवाया
    • नाहरगढ़ दुर्ग में एक जैसे 9 महल बनवाये

  • सवाई प्रतापसिंह
    • सवाई प्रताप सिंह के शासनकाल को संगीत का स्वर्ण काल कहा जाता है
    • 1787 ई. में जयपुर के तुंगा में सवाई प्रताप सिंह और महादजी सिंधिया के मध्य युद्ध हुआ
    • 1799 ई. में जयपुर में 5 मंजिला हवामहल का निर्माण करवाया गया, हवामहल भगवान विष्णु को समर्पित है
    • हवामहल में 953 खिड़कियां है, हवामहल का वास्तुकार उस्ताद लालचंद्र था
    • सवाई प्रताप सिंह ब्रिजनिधि उपनाम से कविताएं लिखता था, इसकी कविताओं के संग्रह को ब्रिजनिधि ग्रंथावली के नाम से जाना जाता है
    • सवाई प्रताप सिंह के दरबार में 22 विद्वान रहते थे, जिन्हें  प्रताप बाईसी/गंधर्व बाईसी कहा जाता था
    • सवाई प्रताप सिंह के संगीत गुरु चाँदखां थे, सवाई प्रताप सिंह के द्वारा गुरू को बुद्ध प्रकाश की उपाधि दी
    • सवाई प्रताप सिंह ने राधा गोविंद संगीत सार नामक ग्रंथ लिखा

  • सवाई जगतसिंह
    • सवाई जगतसिंह ने 15 अप्रैल 1818 को अंग्रेजों से संधि कर उनकी अधीनता स्वीकार की।
    • रसकपुर नामक नर्तकी से संबंध होने के कारण इसे जयपुर का बदनाम शासक भी माना जाता है।
    • मेवाड़ राजकुमारी कृष्णा से विवाह के मामले को लेकर 13 मार्च, 1807 को गिंगोली (नागौर) के युद्ध में मारवाड़ के शासक मानसिंह को परास्त किया।

  • सवाई राम सिंह द्वितीय 
    • राज्याभिषेक के समय सवाई राम सिंह द्वितीय अल्पव्यस्क होने के कारण शासन पर रीजेंसी कौंसिल के अध्यक्ष मेजर लुडलो का नियंत्रण रहा।
    • लूडलों ने राजस्थान में समाधि प्रथा और कन्या क्रय विक्रय पर सर्वप्रथम जयपुर रियासत में प्रतिबंध लगाया।
    • 1857 की क्रांति के समय सवाई राम सिंह द्वितीय ने अंग्रेजों का सहयोग किया, इसके उपलक्ष में अंग्रेजों द्वारा सितार ए हिंद की उपाधि प्रदान की गई।
    • सवाई राम सिंह द्वितीय के द्वारा जयपुर में मदरसा हुनरी की स्थापना की गई, जिसका माधोसिंह द्वितीय ने नाम बदलकर राजस्थान स्कूल आफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स कर दिया।
    • ब्रिटिश शासन एडवर्ड पंचम के जयपुर आगमन पर राम सिंह ने 1868 ईस्वी में जयपुर को गुलाबी रंग से पुतवाया।
    • सवाई राम सिंह द्वितीय ने 1876 ईस्वी में पोथिखाना और प्रिंस अल्बर्ट के जयपुर आगमन पर अल्बर्ट हॉल संग्रहालय की स्थापना करवाई गयी।
    • सवाई राम सिंह द्वितीय ने जयपुर में राम प्रकाश थिएटर, रामनिवास बाग, रामगढ़ बांध, महाराजा स्कूल व संस्कृत स्कूल की स्थापना की।

  • सवाई माधोसिंह द्वितीय 
    • सवाई माधोसिंह द्वितीय के शासनकाल में राजस्थान के जयपुर में सर्वप्रथम 1904 ई. में डाक टिकट और पोस्टकार्ड की शुरुआत हुई।
    • बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए मदनमोहन मालवीय को पांच लाख रुपयों का अनुदान दिया।
    • चंद्रमहल में प्रसिद्ध मुबारक महल का निर्माण करवाया, जो मुगल - राजपूत एवं यूरोपियन स्थापत्य कला का नमूना है।
    • ब्रिटिश शासन एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के अवसर पर चांदी के दो बड़े कलशो में गंगाजल लेकर लंदन गया।
    • यह चांदी के कलश वर्तमान में मुबारक महल में रखे गए हैं, जो दुनिया के सबसे बड़े चांदी के पात्र माने जाते है।

  • सवाई मानसिंह द्वितीय 
    • कच्छवाहा वंश के अंतिम शासक सवाई मानसिंह द्वितीय थे।
    • राजमाता गायत्री देवी सवाई मानसिंह द्वितीय की पत्नी थी।
    • 1943 ई. में जयपुर में महारानी गायत्री देवी स्कूल का निर्माण करवाया गया।
    • मानसिंह 1949 से 1956 ई तक राजस्थान के राज्य प्रमुख पद पर रहे।
    • मानसिंह पोलो का प्रसिद्ध खिलाड़ी रहा है।
    • सवाई मानसिंह द्वितीय के प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माइल को आधुनिक जयपुर का निर्माता कहा जाता है।
    • मानसिंह की मृत्यु 24 जून 1970 में लंदन में पोलो खेलते समय घोड़े से गिरकर हुई।
    • सवाई मानसिंह द्वितीय की पत्नी गायत्री देवी राजस्थान में प्रथम महिला लोकसभा सदस्य रही है।

RAJASTHAN Me 1857 ki Kranti | राजस्थान में 1857 ई. की क्रांति

राजस्थान CET स्नातक स्तर परीक्षा से संबंधित 1857 ई. की क्रांति के बारे में विस्तृत विवरण

  • राजस्थान में क्रांति का प्रारम्भ 28 मई, 1857 को नसीराबाद सैनिक छावनी की 15वीं नेटिव इंफेंट्री के सैनिकों ने की।
  • भारत में 10 मई, 1857 को मेरठ की छावनी में भारतीय सैनिको के विद्रोह में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति की शुरुआत की गई।
  • 1857 की क्रांति के दौरान राजपूताना रेजीडेंसी का प्रशासन उत्तर पश्चिमी प्रान्त के लेफ्टिनेंट गवर्नर कॉल्विन के नियंत्रण में था, जिसका मुख्यालय आगरा था
  • राजपूताना रेजीडेंसी में एजेंट टू गवर्नर जनरल (AGG) जॉर्ज पैट्रिक लारेंस थे
  • इसका कार्यालय अजमेर था 
  • ए.जी.जी. के अधीन कई पॉलिटिकल एजेंट थे, जो राज्यों में नियुक्त थे
  • 1857 की क्रांति के दौरान राजस्थान में नियुक्त पॉलिटिकल एजेंटस की स्थिति निम्नानुसार थी - 
    • ​कैप्टन सी.एल.शावर्स - उदयपुर
    • विलियम ईडन - जयपुर
    • माक मेसन - जोधपुर 
    • मेजर बर्टन - कोटा
    • मेजर निक्सन - भरतपुर 
  • 1857 की क्रांति में कोटा में विद्रोह 15 अक्टूबर, 1857 दिनांक को हुआ।
  • कोटा में विद्रोह कोटा राज्य के भूतपूर्व वकील जयदयाल और सेना में रिसालदार मेहराब खान के नेतृत्व में किया गया
  • विद्रोहियों ने पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन, उसके 2 पुत्रो और एजेंसी के सर्जन डॉ. सेडलर की हत्या कर दी
  • कोटा विद्रोह के समय कोटा के शासक महाराजा रामसिंह थे
  • 30 मार्च, 1858 को अंग्रेज सेना ने कोटा को विद्रोहियों से मुक्त करवा लिया
  • जयदयाल और मेहराब खान को एजेंसी भवन के निकट पेड़ पर फांसी दी गई
  • मेजर बर्टन की हत्या की जांच के लिए लार्ड राबर्ट्स की अध्यक्षता में में एक जाँच आयोग का गठन किया गया
  • कोटा महाराव को तोपों की सलामी की संख्या 17 से घटाकर 13 कर दी गई

  • जोधपुर की एरनपूरा छावनी में 21 अगस्त, 1857 में जोधपुर लीजन के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया
  • एरिनपुरा छावनी के सैनिकों के द्वारा ही विद्रोह के दौरान "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी" का नारा दिया गया।
  • 1835 ई. में अंग्रेजों द्वारा जोधपुर लीजन का गठन किया गया।
  • जोधपुर लीजन का मुख्यालय एरिनपुरा में रखा गया।
  • देवली छावनी -  कोटा कंटिजेंट  
  • खेरवाड़ा छावनी - मेवाड़ भील कौर 
  • नसीराबाद छावनी - बंगाल नैटिव इन्फेंट्री के सैनिक थे।
  • राजस्थान में 1857 की क्रांति के समय 06 सैनिक छावनियाँ थी।
  • 06 सैनिक छावनियाँ  - नीमच, नसीराबाद, देवली, खेरवाड़ा, ऐरनपुरा और ब्यावर।
  • सैनिक छावनियों में अंग्रेज सैनिक थे, मगर अधिकांश सैनिक भारतीय थे।
  • छावनियों में सबसे शक्तिशाली छावनी नसीराबाद थी, जिसमे बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक थे।

  • आउवा के किले में सुगाली माता जी की मूर्ति प्रतिष्ठापित थी।
  • कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) के नेतृत्व में विद्रोहीयों की सैन्य टुकड़ी द्वारा जोधपुर की राजकीय सेना को बिथोरा नामक स्थान पर दिनांक 8 सितम्बर, 1857 को पराजित किया था।
  • 18 सितम्बर, 1857 को चेलावास नामक स्थान पर ए.जी.जी. लॉरेन्स की सैन्य टुकड़ी कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) के नेतृत्व में विद्रोहीयों की सैन्य टुकड़ी से पराजित होकर पीछे हट गई, इस युद्ध में जोधपुर के पॉलिटिक्ल एजेंट माक मेसन मारा गया
  • 1857 की क्रांति के दौरान कर्नल होम्स के नेतृत्व में एक सेना के द्वारा दिनांक 20 जनवरी, 1858 को आउवा को चारों तरफ से घेर लिया गया।
  • जीत की आशा न देखकर कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) बचकर निकल गया।
  • किलेदार के विश्वासघात के कारण 24 जनवरी, 1858 को अंग्रेजी सेना ने किले पर अधिकार कर लिया।
  • सुगाली माता की मूर्ति को होम्स उठाकर अजमेर ले गया, जिसे अजमेर म्यूजियम में रखा गया हैं।
  • सुगाली माता के 10 सर और 54 हाथ हैं।

  • 15 वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री अजमेर में कम्पनी खजाने और गोला बारूद की सुरक्षा में तैनात थी।
  • 10 मई, 1857 को मेरठ की छावनी में भारतीय सैनिको के विद्रोह के उपरांत ए.जी.जी लारेंस को बंगाल इन्फेंट्री पर विश्वास नही था, क्योंकि यह सैनिक मेरठ से अजमेर आये थे।
  • उक्त कारण अजमेर की सुरक्षा का जिम्मा 15 वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री से ले लिया गया था, इस सैनिक टुकड़ी को नसीराबाद भेज दिया गया
  • इस कारण 15 वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक इस घटना से आहत थे
  • अजमेर की सुरक्षा के लिए मेर रेजिमेंट तैनात की गयी और डीसा से अंग्रेज सेना बुलायी गयी
  • 28 मई, 1857 को नसीराबाद सैनिक छावनी की 15वीं नेटिव इंफेंट्री के सैनिकों ने विद्रोह शुरू कर दिया और 2 अंग्रेज अधिकारियों - मेजर स्पोटिस वुड एवं कर्नल न्यूबारी की हत्या कर दी गयी।
  • 1857 की क्रांति के दौरान धौलपुर का शासक भगवंत सिंह था।
  • धौलपुर का शासक अंग्रेजों का समर्थक था।
  • धौलपुर के शासक द्वारा मथुरा और करौली में विद्रोहियों को दबाने के लिए सेना भेजी और धौलपुर आने वाले अंग्रेजों को सुरक्षित आगरा पहुँचाया।
  • तख्त सिंह
    • जोधपुर के महाराजा तख्त सिंह पूर्ण निष्ठा और सक्रियता से 1857 की क्रांति को दबाने में अंग्रेजों का सहयोग किया।
    • जोधपुर की राजकीय सेना विद्रोहियों के दमन के लिए भेजी गई
  • राम सिंह
    • रामसिंह 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम के समय जयपुर के महाराजा थे।
    • रामसिंह भी क्रांति के दौरान अंग्रेजों के प्रति पूर्ण वफादार थे।
    • क्रांति के दौरान जयपुर में लूटपाट या विद्रोह की कोई घटना नही हुई।
  • मदनपाल
    • मदनपाल 1857 ई. की क्रांति के समय करौली का शासक था।
    • मदनपाल भी विद्रोह के दौरान अंग्रेजभक्त बना रहा।
    • ए.जी.जी ने करौली के शासक की तोपों की राजपत्री की संख्या 17 कर दी थी।
  • 1857 ई. की क्रांति के दौरान बीकानेर का शासक सरदार सिंह राजस्थान के शासकों में एकमात्र शासक थे, जिन्होंने विद्रोहियों को दबाने के स्वयं अभियान का नेतृत्व किया
  • सरदार सिंह 5000 सैनिक लेकर पंजाब के होसी, सिरसा और हिसार जिलो में गया
  • अंग्रेज सरकार इनकी सेवा से प्रसन्न होकर टीबी परगने के 41 गाँव दिए
  •  दलपत सिंह
    • 1857 ई. की क्रांति के समय प्रतापगढ़ के शासक दलपत सिंह थे
    • दलपत सिंह ने विद्रोहियों को दबाने के लिए अपनी सेना नीमच भेजी
    • अपने राज्य से विद्रोहियों को गुजरने नही दिया
  • नवाब वजीरूद्दौला
    • 1857 ई. की क्रांति के समय टोंक के नवाब वजीरूद्दौला थे
    • नवाब वजीरूद्दौला भी अंग्रेज समर्थक था, लेकिन उसकी सेना ने विद्रोहियों का साथ दिया
    • टोंक के नवाब के मामा मीर आलमखां अंग्रेज विरोधी था, उसने खुलकर अंग्रेजों का विरोध किया और राज्य की सेना के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया
  • रणजीत सिंह 
    • 1857 ई. की क्रांति के समय जैसलमेर के महारावल रणजीत सिंह थे
    • रणजीतसिंह भी अंग्रेजी सेना के प्रति पूर्ण निष्ठा के साथ सहयोग प्रदान किया था
  • 18 सितम्बर, 1857 को चेलावास नामक स्थान पर ए.जी.जी. लॉरेन्स की सैन्य टुकड़ी कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) के नेतृत्व में विद्रोहीयों की सैन्य टुकड़ी से पराजित होकर पीछे हट गई।
  • इस युद्ध में जोधपुर के पॉलिटिक्ल एजेंट माक मेसन मारा गया।
  • चेलावास के युद्ध को राजस्थान साहित्य में गोरे - कालो का युद्ध कहा गया है
  • स्वतंत्रता संग्रामियों ने पॉलिटिक्ल एजेंट माक मेसन का सर धड़ से अलग कर आउवा में घुमाया और उसे किले के दरवाजे पर टांग दिया।
  • बिथोरा का युद्ध
    • कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) के नेतृत्व में विद्रोहीयों की सैन्य टुकड़ी द्वारा जोधपुर की राजकीय सेना को बिथोरा नामक स्थान पर दिनांक 8 सितम्बर, 1857 को पराजित किया था।
  • कोटा का विद्रोह
    • ​1857 की क्रांति में कोटा में विद्रोह 15 अक्टूबर, 1857 दिनांक को हुआ।
    • कोटा में विद्रोह कोटा राज्य के भूतपूर्व वकील जयदयाल और सेना में रिसालदार मेहराब खान के नेतृत्व में किया गया।
    • विद्रोहियों ने पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन, उसके 2 पुत्रो और एजेंसी के सर्जन डॉ. सेडलर की हत्या कर दी।
    • कोटा विद्रोह के समय कोटा के शासक महाराजा रामसिंह थे।
  • नसीराबाद का विद्रोह
    • राजस्थान में क्रांति का प्रारम्भ 28 मई, 1857 को नसीराबाद सैनिक छावनी की 15वीं नेटिव इंफेंट्री के सैनिकों ने की।

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताए | Rajasthan Ki Prachin Sbhaytaye

 राजस्थान CET स्नातक स्तर परीक्षा से संबंधित प्राचीन सभ्यताओं के बारे में विस्तृत विवरण

कालीबंगा सभ्यता 

  • कालीबंगा में रक्षा प्राचीर से दुर्ग तथा निचले नगर के घिरे होने का साक्ष्य प्राप्त हुआ हैं।
  • इसका निर्माण कच्ची मिट्टी की ईंटो से किया गया था
  • कालीबंगा वर्तमान में राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के किनारे स्थित हैं
  • सर्वप्रथम 1952 में अमलानंद घोष के द्वारा खोज की गई और तत्पश्चात 1961 से 1964 के मध्य श्री बी.बीलालश्री बीकेथापर एवं श्री एमडीखरे द्वारा उत्खनन कार्य करवाया गया
  • यहाँ उत्खनन 05 स्तरों तक किया गया
  • कालीबंगा सुव्यवस्थित नगर योजना के अनुसार बसा हुआ था
  • समकोण पर कटती सड़के एवं सड़कों के किनारे नालियां विकास की परिचायक थी 
  • कालीबंगा से जूते हुए खेत के प्रतीक मिलते हैं 
  • कालीबंगा में भूकंप आने के प्राचीनतम प्रतीक भी मिलते हैं 
  • कालीबंगा की लिपी सिन्धु लिपी के समान ही थी, जिसे दायें से बायें लिखा गया था 


बैराठ की सभ्यता

  • बैराठ वर्तमान में राजस्थान के कोटपूतली बहरोड़ जिले में स्थित हैं
  • बैराठ सभ्यता का उत्खनन 1937 में दयाराम साहनी के द्वारा करवाया गया, तत्पश्चात 1962-63 में नीलरत्न बनर्जी एवं कैलाशनाथ के निर्देशन में उत्खनन कार्य करवाया गया
  • बैराठ की गणेशबीजक एवं भीम की डूंगरी से प्राचीन शैल चित्रों के प्रमाण प्राप्त हुये है
  • यहाँ चाँदी की आठ 'पंचमार्क' और इन्डोग्रीक शासकों की 28 मुद्राएँ मिली हैं
  • बैराठ से अशोक स्तम्भ एवं एक गोल मंदिर के अवशेष भी मिले हैं
  • बैराठ के निकट से ही अशोक का भाब्रू अभिलेख प्राप्त हैं, जो अशोक को बोद्ध धर्मानुयायी सिद्ध करता हैं

आहड सभ्यता


  • आहड़ राजस्थान के उदयपुर जिले में आहड़ नदी (बेडच) के तट पर स्थित है
  • यहाँ उत्खनन में चार हजार वर्ष पुरानी प्रस्तर धातु युगीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुये है
  • इसका उत्खनन सर्वप्रथम 1953 में अक्षय कीर्ति व्यास के द्वारा किया गया
  • यहाँ उत्खनन में बस्तियों के आठ स्तर मिले हैं
  • यहाँ मकानों में एक से अधिक चूल्हे मिलना संयुक्त परिवार प्रणाली की विद्यमानता को प्रकट करते हैं
  • आहड़ सभ्यता से मिले मृदभांड इसको लाल काले मृदभांड वाली संस्कृति का प्रमुख केंद्र सिद्ध करते हैं
  • आहड़ का दूसरा नाम ताम्रवती नगरी भी मिलता हैं  जो यहाँ तांबे के ओजारो एवं उपकरणों के अत्यधिक प्रयोग का सूचक हैं
  • तोल के बाट व माप मिलना यहाँ वाणिज्य व्यापार की उन्नति के संकेत करता हैं 

बालाथल सभ्यता


  • बालाथल वर्तमान में उदयपुर की वल्लभनगर तहसील के बालाथल ग्राम में स्थित हैं
  • बालाथल सभ्यता का उत्खनन प्रोवी.एनमिश्र के निर्देशन में 1993 . में किया गया हैं
  • बालाथल में 1800 ईसा पूर्व के लगभग ताम्र पाषाणीक सभ्यता तथा 600 ईसा पूर्व लोहयुगीन सभ्यता आबाद होने का अनुमान हैं
  • उत्खनन में लोहे के ओजार प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुये हैं
  • लोहा गलाने की पांच भट्टियों के अवशेष भी प्राप्त हुये हैं
  • लोह युग में यहाँ नलकूप होने के भी संकेत मिले हैं
  • उत्खनन में मिट्टी से बनी सांड की आकृतियां मिली है, जिनका प्रयोग संभवतः पूजा के लिए किया जाता था

गणेश्वर सभ्यता


  • गणेश्वर सभ्यता वर्तमान में राजस्थान के नीम का थाना जिले में कांटली नदी के उदगम पर स्थित हैं।
  • इसका उत्खनन रत्नचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में हुआ हैं।
  • यहाँ से 2800 ईसा पूर्व की सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुये हैं।
  • गणेश्वर से प्रचुर मात्रा में ताम्र आयुध व उकरण मिले हैं जो इसे ताम्रयुगीन सभ्यताओं में प्राचीनतम सिद्ध करते हैं।
  • गणेश्वर भारत की ताम्र सभ्यताओ की जननी माना जाता हैं।
  • गणेश्वर में मकानों के लिए पत्थर का प्रयोग करने के साक्ष्य मिलते हैं।
  • बस्ती को बाढ़ से बचाने के लिए पत्थर के बाँध भी बनाये जाते थे।