गुहिल राजवंश
गुहिल वंश का मूल पुरुष गुहिल ने मेवाड़ में अपना राज्य स्थापित किया।
शिलालेखों के अनुसार शील, अपराजित, भर्तभट्ट, अल्ल्ट, नरवाहन,शक्तिकुमार, विजयसिंह आदि गुहिल के उतराधिकारी हुये।
नैणसी एवं कर्नल टॉड ने मेवाड़ के गुहीलों का संबंध वल्लभी के शासक वंश से होना बताया है, कर्नल टॉड के ने गुहिलों की 24 शाखों का उल्लेख किया है, जिसमें कल्याणपुर, वागड़, चाटसू, धोड़ एवं काठियावाड़ के गुहिल अधिक प्रसिद्ध है।
डॉ. गौरी शंकर हीराचंद ओझा का मानना है कि 566 ई के लगभग गुहिल ने अपना शासन स्थापित किया।
डी. आर. भंडारकर ने आहड से प्राप्त लेख के आधार पर मेवाड़ के गुहिलो का ब्राह्मण माना और गुहिल का आनंदपुर से आना लिखा है।
कविराजा श्यामल दास ने वीर विनोद में गुहीलों का वल्लभी से आना बताया है।
कुंभलगढ़ प्रशस्ति एवं एकलिंग महामात्य भी गुहिल वंश को आनंदपुर के ब्राह्मण वंश से संबंध करते हैं।
नैणसी और गोपीनाथ शर्मा ने भी मेवाड़ के गुहिलो के ब्राह्मण वंशी होने से सहमत है।
अबुल फजल ने मेवाड़ के गुहिलों को ईरान के बादशाह नौशेरवा के वंश से उत्पन्न होना लिखा है।
गुहिल के बाद मेवाड़ का प्रतापी शासक बप्पा हुआ।
बप्पा रावल (734 - 753 ई.)
कुंभलगढ़ प्रशस्ति बप्पा रावल को विप्र बताती है।
कुंभलगढ़ प्रशस्ति की वजह से ही डॉ डी. आर. भंडाकर ने मेवाड़ के गुहीलों को ब्राह्मण माना।
नैणसी एवं कर्नल टॉड ने हारित ऋषि की कृपा से बप्पा के राज्य प्राप्ति का उल्लेख किया है.।
राज प्रशस्ति के अनुसार बप्पा ने 734 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ के शासक मानमोरी को परास्त कर चित्तौड़गढ़ पर अधिकार किया।
बप्पारावल की राजधानी नागदा थी।
बप्पा रावल ने हिंदुआ सूरज की उपाधि धारण की थी।
बप्पारावल ने कैलाशपुरी में एकलिंग जी मंदिर का निर्माण करवाया, एकलिंग जी गुहिल वंश के कुल देवता थे।
बप्पा का सोने का एक सिक्का मिला है, जो 115 ग्रैन का है।
गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार बप्पा का वास्तविक नाम कालभोज था, बप्पा कालभोज की उपाधि थी।
आटपुर प्रशस्ति (977 ई.) में भोज, महेन्द्र और नाग का उल्लेख गुहिल वंश के शासकों के रूप में मिलता है।
भोज एक शक्तिशाली शासक था, जबकि महेन्द्र भीलों से पराजित हो गया।
नाग का अधिकार नागदा और इसके आसपास के क्षेत्रों पर था।
नाग के उत्तराधिकारी शिलादित्य ने भीलों को परास्त कर अपनी पैतृक भूमि पर पुनः अधिकार किया।
अपराजित ने मेवाड़ के शत्रुओं को अपने शौर्य से परास्त किया।
कालभोज और खुम्माण प्रथम जैसे शासक भी शक्तिशाली थे; खुम्माण प्रथम ने अरब आक्रमणकारियों को हराया।
खुम्माण तृतीय (877-926 ई.) ने मेवाड़ की शक्ति को पुनर्स्थापित किया, और उसे कई प्रदेशों का विजेता बताया गया है।
खुमान तृतीय के उत्तराधिकारी भर्तभट्ट ने राष्ट्रकूट राजकुमारी से विवाह किया।
अल्ल्ट ने राष्ट्रकूटों की सहायता से परमारो को परास्त किया और हूण कन्या हरिया देवी से विवाह किया।
अल्ल्ट ने आहड में वराह मंदिर का निर्माण करवाया।
अल्लट के समय आहड़ एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
अल्लट के उत्तराधिकारी नरवाहन ने मेवाड़ को और मजबूत किया।
शक्तिकुमार के समय परमार शासक मुंज ने आहड़ को नष्ट किया और चित्तौड़ पर कब्जा कर लिया।
अम्बा प्रसाद चौहान राजा वाक्पतिराज से पराजित हुए।
इसके बाद कई शासक आए, जिनमें विक्रमसिंह और उनके उत्तराधिकारी रणसिंह शामिल थे; रणसिंह से रावल और राणा शाखाओं का उदय हुआ।
1303 ई. तक मेवाड़ पर रावल शाखा का शासन रहा, और रावल शाखा के अंतिम शासक रतनसिंह थे।
रणसिंह के उत्तराधिकारी सामंतसिंह ने गुजरात के अजयपाल से मेवाड़ का भू-भाग वापस प्राप्त किया।
सामंतसिंह का विवाह पृथ्वीराज द्वितीय की बहन पृथ्वीबाई से हुआ।
सामंतसिंह को कीतू चौहान से संघर्ष करना पड़ा, जिससे उन्हें मेवाड़ छोड़कर वागड़ में नया राज्य स्थापित करना पड़ा (1178 ई.)।
सामंतसिंह के भाई मथनसिंह ने कीतू को हराकर मेवाड़ पर पुनः अधिकार कर लिया।
मथनसिंह के बाद पद्मसिंह और फिर जैत्रसिंह ने मेवाड़ का शासन संभाला।
जैत्रसिंह (1213 - 1250 ई.)
जैत्रसिंह ने मेवाड़ की प्रतिष्ठा पुन स्थापित की, उसने परमारो से चित्तौड़ छीनकर उसे अपनी राजधानी बनाया।
जयसिंह सूरी के ग्रंथ हमीर मदमर्दन के अनुसार जैत्रसिंह ने 1227 ई. में भूताला के युद्ध में दिल्ली के गुलाम वंश के सुल्तान इल्तुमिश की सेना को पराजित किया।
चीरवा के शिलालेख में वर्णित है कि जैत्रसिंह इतना शक्तिशाली था कि मालवा, गुजरात, मारवाड़, जांगल तथा दिल्ली के शासक उसको पराजित नहीं कर सके।
आहड को चालुक्यों से मुक्त करवा के वागड़, कोटड़ा आदि स्थानों को अपने साम्राज्य में मिलाया।
मदन और बालाक जैत्रसिंह के योग्य सेनाधिकारी थे, जिन्होंने मेवाड़ राज्य की सीमा मत्स्य एवं मालवा तक प्रसारित की।
तेजसिंह (1250 - 1273 ई.)
जैत्रसिंह का उतराधिकारी तेजसिंह हुआ।
तेजसिंह की पत्नी जेतल देवी ने चित्तौड़गढ़ में श्याम पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
तेज सिंह के शासनकाल में 1260 ई. में आहड में कमलचंद्र द्वारा राजस्थान का ताड़पत्र पर चित्रित प्रथम ग्रंथ "श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी" चित्रित किया गया।
तेजसिंह का उतराधिकारी समरसिंह था।
रावल रतनसिंह (1302-03 ई.)
रावल रतन सिंह को 1303 ई. में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का सामना करना पड़ा।
युद्ध का कारण अलाउद्दीन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा व चित्तौड़ की सैनिक एवं व्यापारिक उपयोगिता थी।
गुजरात, मालवा, मध्य प्रदेश, संयुक्तप्रांत, सिंध आदि भागों के व्यापारिक मार्ग चित्तौड़ से होकर गुजरते थे।
1540 ई. में मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा लिखित पद्मावत में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण का कारण रावल रतन सिंह की पत्नी पद्मिनी को प्राप्त करना बतलाया गया है।
अलाउद्दीन की सेना से लड़ते हुए रतन सिंह और उसके सेनापति गोरा और बादल वीरगति को प्राप्त हुए।
रानी पद्मिनी ने 1600 महिलाओं के साथ जौहर कर लिया, जो चित्तौड़ का पहला साका (जौहर एवं केसरिया) कहलाता है।
अमीर खुसरो युद्ध के समय साथ थे, जिसने अपने ग्रंथ तारीख ए अलाई में आक्रमण का आंखों देखा वर्णन लिखा है।
अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्रखां को चित्तौड़ का प्रशासक नियुक्त कर, चित्तौड़ का नाम खिरजाबाद कर दिया।
धाईबी पीर की दरगाह के लेख में चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद मिलता है।
खिज्रखां 1311 ई. तक चित्तौड़ में रहा और बाद में जालौर के कान्हडदेव का भाई मुंछाला मालदेव चित्तौड़ का प्रशासक रहा।
रतन सिंह मेवाड़ के गुहिल वंश की रावल शाखा का अंतिम शासक था।
राणा हम्मीर (1326 - 64 ई.)
सिसोदा ठिकाने के जागीरदार हम्मीर ने 1326 ई. में चित्तौड़गढ़ पर अधिकार कर गुहिल वंश की पुन स्थापना की।
सिसोदे का जागीरदार होने से उसे सिसोदिया कहा गया, उसने बाद मेवाड़ के सभी शासक सिसोदिया कहलाए।
हम्मीर राणा शाखा का राजपूत था, इसलिए इसके बाद के शासक सभी शासक राणा या महाराणा कहलाए हैं।
हम्मीर को मेवाड़ के उद्धारक की संज्ञा दी जाती है।
कुंभलगढ़ प्रशस्ति से में हम्मीर को विषम घाटी पंचानन कहा गया।
राणा हम्मीर ने सिंगोली बांसवाड़ा के युद्ध में मोहम्मद बिन तुगलक की सेना को हराया था।
राणा हम्मीर ने चित्तौड़ में अन्नपूर्णा माता का मंदिर करवाया।
महाराणा लाखा (1382 - 1421 ई.)
राणा क्षेत्रसिंह बूंदी विजय के प्रयास में मारे गए, उसके बाद 1382 ई. में महाराणा लाखा मेवाड़ का शासक बना।
महाराणा लाखा के साथ बूंदी के नकली दुर्ग की कथा जुड़ी हुई है जिसकी रक्षा के लिए कुम्भा हाडा ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
जावर की चांदी की खान लाखा के समय में खोजी गई।
लाखा के शासनकाल में पिछोला झील छितर बंजारे के द्वारा बनवाई गई।
मारवाड़ के शासक रणमल की बहन हंसबाई का विवाह लाखा के पुत्र चुंडा के साथ होना था। लेकिन हंसाबाई का विवाह लाखा के साथ हो गया, जिससे उसके योग्य पुत्र चुंडा को राज्य अधिकार से वंचित होना पड़ा।
चुंडा को मेवाड़ का भीष्म पितामह भी कहा जाता है।
महाराणा मोकल (1421 - 1433 ई.)
राणा मोकल लाखा एवं हंसाबाई का पुत्र था।
प्रारंभिक शासनकाल में इसके मामा राठौड़ रणमल का प्रभाव था।
मोकल ने 1428 ई. में रामपुरा (भीलवाड़ा) के युद्ध में नागौर के फिरोज खान को परास्त किया।
मोकल ने चित्तौड़ में द्वारिकानाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
परमार भोज द्वारा बनवाए गए त्रिभुवन नारायण मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, इस मंदिर को मोकल का मंदिर या समिद्धेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
1433 ई. में मोकल की झीलवाड़ा (भीलवाड़ा) में उसके चाचाओं (चाचा व मेरा) ने महपा पवार के साथ मिलकर हत्या कर दी।
महाराणा कुम्भा (1421 - 1468 ई.)
महाराणा कुम्भा के पिता का नाम मोकल एवं माता का नाम सौभाग्य देवी था।
कुम्भा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया, जिसमें सिरोही, बैराठ, अचलगढ़ एवं कुंभलगढ़ के दुर्ग प्रसिद्ध है।
कुंभलगढ़ का दुर्ग अपनी विशेष भौगोलिक स्थिति व बनावट के कारण प्रसिद्ध है, इसका शिल्पी मंडन था।
कुम्भलगढ़ किले के अंदर एक लघु दुर्ग है, जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है।
कुम्भलगढ़ दुर्ग के बारे में अबुल फजल ने लिखा है कि यह इतनी ऊंचाई पर स्थित है कि ऊपर देखने पर पगड़ी भी सिर से नीचे गिर जाती है।
1437 ई. में सारंगपुर के युद्ध में मालवा के शासक महमूद खिलजी को परास्त कर बंदी बना लिया, इस विजय के उपलक्ष में कुंभा ने कीर्ति स्तंभ का निर्माण करवाया।
कुंभा ने चित्तौड़ में कुंभस्वामी एवं श्रृंगारचोरी का मंदिर, एकलिंग जी के मीरा मंदिर और रणकपुर के मंदिर बनवाये।
संगीत राज एवं संगीत मीमांसा कुम्भा के द्वारा रचित ग्रंथ थे।
कुंभा ने चंडीशतक की व्याख्या, गीत गोविंद और संगीत रत्नाकर पर टिका लिखी।
महाराणा कुम्भा के काल में कवि अत्री व महेश ने कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति की रचना की।
साहित्य ग्रंथो और प्रशस्तियों में महाराणा कुंभा को महाराजाधिराज, रावराय, राणेराय, दानगुरु, राजगुरु, परमगुरु, हालगुरू, अभिनव भरताचार्य और हिंदू सुरताण आदि विरुदो से विभूषित किया गया।
1468 ई. में महाराणा कुम्भा की हत्या उसके पुत्र उदा के द्वारा कर दी गई।
रायमल (1473 - 1509 ई.)
कुम्भा के पुत्र रायमल ने अपने भाई उदा को दाड़िमपुर के युद्ध में परास्त कर मेवाड़ का शासक बना।
रायमल ने चित्तोड़ में अद्भुतजी के मंदिर का निर्माण करवाया।
रायमल की पत्नी श्रंगारदेवी ने घौसूणडी की बावड़ी (चित्तोड़) का निर्माण करवाया।
राणा सांगा (1509 - 1528 ई.)
इतिहास में हिंदूपत के नाम से प्रसिद्ध महाराणा सांगा 1509 ई. में मेवाड़ का शासक बना।
1520 ई. में महाराणा सांगा ने गुजरात की सेना को परास्त किया।
मालवा का शासक मेदिनी राय को मालवा के अमीरों ने गुजरात की सहायता भगा दिया, मेदिनीराय राणा सांगा की शरण में चला गया, जिससे मालवा एवं मेवाड़ में युद्ध हुआ।
मालवा का सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय पराजित हुआ और राणा सांगा के द्वारा बंदी बना लिया।
1517 ई. में महाराणा सांगा ने खातोली, कोटा जिले में के युद्ध में दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को परास्त किया, राणा सांगा उत्तर भारत का शक्तिशाली शासक बन गया।
17 मार्च 1527 ई को खानवा के मैदान में बाबर और राणा सांगा के बीच युद्ध हुआ।
तोपखाने एवं तुलुगुमा युद्ध पद्धति के कारण बाबर की विजय हुई, राणा सांगा युद्ध में घायल हुआ एवं युद्ध के मैदान से दूर ले जाया गया।
राणा सांगा ने अपनी पराजय का बदला लिए बिना चित्तौड़ लौटने से इनकार कर दिया, तब उसके सामंतों ने जो युद्ध नहीं करना चाहते थे, सांगा को विष दे दिया।
30 जनवरी 1528 को बसवा (दौसा) में सांगा की मृत्यु हो गई।
मांडलगढ़ में सांगा का समाधि स्थल है।
सांगा अंतिम हिंदू राजा था, जिसके सेनापतित्व में सब राजपूत जातियाँ विदेशियों को भारत से निकलने के लिए सम्मिलित हुई।
सांगा ने अपने देश की रक्षा में एक आंख, एक हाथ, एक पेर खो दिया, उसके शरीर पर 80 घाव थे।
कर्नल जेम्स टॉड राणा सांगा को सैनिक का भग्नावशेष कहा है।
खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से चंदेरी के मेदिनीराय, आमेर के पृथ्वीराज, जोधपुर के कुंवर मालदेव, काठियावाड़ के झाला अज्जा, मेवात के हसन खां मेवाती, महमूद लोदी, जालौर के अखैराज सोनगरा, बीकानेर के कुंवर कल्याणमल, वागड़ के उदय सिंह, देवलिया के बागसिंह, सिरोही के अखयराज देवड़ा और ऊपरमाल के अशोक परमार ने भाग लिया।
राणा सांगा की मृत्यु के बाद राणा रतन सिंह व उसके पश्चात राणा विक्रमादित्य मेवाड़ का शासक बना।
राणा विक्रमादित्य (1531 - 1536 ई.)
विक्रमादित्य राणा सांगा और कर्मावती का पुत्र था।
विक्रमादित्य के शासनकाल में 1534 ई में गुजरात के शासक बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया।
चित्तौड़ की रक्षा हेतु कर्मावती ने हुमायूं के पास राखी भेजकर सहायता की याचना की, परंतु समय पर सहायता न मिलने के कारण कर्मावती ने अपने दोनों पुत्रों विक्रमादित्य और उदय सिंह को अपने मायके बूंदी भेज दिया।
चित्तौड़ की रक्षा का भार देवलिया के ठाकुर बाघसिंह को सौंप दिया।
बाघसिंह ने शाही राजचिन्ह धारण कर बहादुर शाह का सामना किया और बाघसिंह वीरगति प्राप्त हुआ।
कर्मावती ने 1300 महिलाओं के साथ जोहर कर लिया, यह घटना चित्तौड़ का दूसरा साका कहलाती है।
1536 ई में बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी।
बनवीर सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज की दासी पत्नी से उत्पन्न पुत्र था, इसने चित्तौड़ में नौकोठा महल/नवलखा महल का निर्माण करवाया।
राणा उदयसिंह (1537 - 1572 ई.)
राणा उदय सिंह को बनवीर से बचाकर कुंभलगढ़ के किले में रखा गया, यही मालदेव के सहयोग से 1537 ई. में उसका राज्याभिषेक हुआ।
1540 ई में मावली (उदयपुर) के युद्ध में मालदेव के सहयोग से बनवीर की हत्या कर मेवाड़ की पैतृक संस्था प्राप्त की।
1546 ई में शेरशाह के चित्तौड़ पर आक्रमण करने की खबर पाकर किले की कुंजियां शेरशाह के पास भिजवा दी, इससे शेरशाह ने किले पर आक्रमण नहीं किया और शेरशाह ने खवास खान को चित्तौड़ में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया ।
राणा उदयसिंह ने 1557 ई में उसने अजमेर के हकीम हाजी खान पठान को पराजित किया।
उदय सिंह ने 1559 ई में अरावली की उपत्यकाओं में उदयपुर नगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।
उदयपुर में उदय सागर झील एवं मोती मगरी के सुंदर महलों का निर्माण करवाया।
1562 ई में मालवा के शासक पराजित शासक बाज बहादुर और मेड़ता के शासक जयमल की को शरण दी।
अक्टूबर, 1567 में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, उदयसिंह ने किले की रक्षा का भार जयमल और फत्ता को सौंप कर गिरवा की पहाड़ी में चला गया।
अकबर ने राणा उदय सिंह को ढूंढने के लिए हुसैन कुली खान को गिरवा की पहाड़ियों में भेजा।
रात्रि के समय किले की दीवार की मरम्मत करवाते समय जयमल अकबर की संग्राम नाम की बंदूक से घायल हो गया।
24 फरवरी 1568 को राजपूतों ने केसरिया बाना धारण कर मुगलों से युद्ध किया, जयमल ने कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठकर युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुआ।
कल्ला राठौड़ और फत्ता सिसोदिया भी लड़ते हुए मारे गए, फत्ता की पत्नी फूल कंवर के नेतृत्व में महिलाओं ने जौहर किया, जो चित्तौड़ का तीसरा साका कहलाता है।
जयमल, फत्ता और कल्ला राठौड़ की छतरियां चित्तौड़ में बनी हुई है।
अकबर ने 25 फरवरी 1568 को चित्तौड़ के किले पर अधिकार करके 30000 व्यक्तियों को कत्लेआम करवाया।
अकबर ने जयमल एवं फत्ता की वीरता से मुक्त होकर आगरा के किले के बाहर गजारूढ़ पाषाण मूर्तियां लगवाई।
28 फरवरी 1572 को होली के दिन गोगुन्दा में महाराणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई।
महाराणा प्रताप (1572 - 1597 ई.)
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ।
महाराणा प्रताप 1572 ई. में मेवाड़ के शासक बने।
मेवाड़ के पहाड़ी प्रदेशों में महाराणा प्रताप को "कीका" के नाम से जाना जाता था।
अकबर से संधि करने के लिए 1572 ई. से 1576 ई. के मध्य चार शिष्ट मंडल क्रमशः जलाल खां, मानसिंह, भगवानदास और टोडरमल के नेतृत्व में भेजे।
1576 ई. के प्रारम्भ में अकबर मेवाड़ अभियान की तैयारी हेतु पंहुचा और मानसिंह को मेवाड़ अभियान का नेतृत्व सौंपा।
18 जून, 1576 को खमनोर के पास मुगल सेना का प्रताप से युद्ध हुआ, जो हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।
प्रताप की सेना के हरावल का नेतृत्व हकीम खां सूर और मुगल सेना के हरावल का नेतृत्व जगन्नाथ कच्छवाह कर रहा था।
हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप के जीवन को संकट में देखकर झाला बीदा ने प्रताप का मुकुट धारण कर युद्ध किया, प्रताप को युद्ध भूमि से दूर भेज दिया, इस युद्ध का परिणाम नहीं निकल सका।
1576 से 1585 वर्ष तक अकबर मेवाड़ पर अभियान भेजता रहा, शाहबाज खान (शाहबाज खान तीन बार सेना लेकर मेवाड़ आया),अब्दुर्रहीम खानखाना के नेतृत्व में सेनाएँ भेजी, मगर उन्हें ज्यादा सफलताएं नहीं मिली।
1585 से 1597 के बीच प्रताप ने चित्तौड़गढ़ एवं मांडलगढ़ को छोड़कर शेष राज्य पर पुन अधिकार कर लिया।
प्रताप चावंड को अपनी राजधानी बनाया और राज्य में सुव्यवस्थता स्थापित की।
19 जनवरी 1597 को प्रताप की मृत्यु हो गई।
चावण्ड के पास बांडोली नामक गांव में प्रताप का अग्नि संस्कार किया गया।
महाराणा प्रताप का नाम राजपूताने के इतिहास में सबसे अधिक सम्मानीय और गौरवान्वित है।
प्रताप के संबंध में कर्नल टॉड लिखते हैं आल्पस पर्वत के समान अरावली में कोई भी ऐसी घाटी नहीं है, जो प्रताप के किसी न किसी वीर कार्य, उज्जवल विजय या उससे अधिक कीर्तियुक्त पराजय से पवित्र नही हुई हो।
हल्दीघाटी मेवाड़ की थर्मोपल्ली और दिवेर मेवाड़ का मैराथन है।
राणा अमरसिंह (1597 - 1620 ई.)
राणा अमर सिंह 1597 ई में मेवाड़ का शासक बना।
अमर सिंह ने अपने युवराज काल में ही मुगलों के विरुद्ध अनेक अभियानों में भाग लिया।
दिवेर के युद्ध 1582 ई. में अमरसिंह ने अपनी सूझबूझ और वीरता से मुगल सेना को पराजित किया।
अमरसिंह के शासक बनने के बाद 1599 ई में सहजादा सलीम (जहांगीर) को मेवाड़ पर आक्रमण के लिए भेजा गया, मगर उसे सफलता नहीं मिली।
मेवाड़ के सामंत युद्धों की वजह से उनकी जागीरे वीरान हो गई थी, इस कारण सरदारों के दबाव के कारण अमर सिंह को झुकना पड़ा और मुगलों से संधि की स्वीकृति देनी पड़ी।
जनवरी,1615 ई में मेवाड़-मुगल संधि हुई, जिसमें महाराणा को शाही दरबार में उपस्थित होने से छूट दी गई, मगर युवराज को मुगल दरबार में भेजने की शर्त रखी गई।
चित्तोड़ पुन मेवाड़ को लौटा दिया गया, उसे मगर उसकी मरम्मत नहीं की जा सकती थी।
26 जनवरी 1620 को उदयपुर के निकट आहड में अमरसिंह का स्वर्गवास हो गया।
महाराणा कर्णसिंह (1620 - 1628 ई.)
कर्णसिंह राज्याभिषेक उत्सव पर जहांगीर ने राणा की पदवी का फरमान, खिलअत आदि भेजें।
यह मेवाड़ का पहला शासक था, जो शासक बनने से पहले मुगल दरबार में रहा एवं जिसके लिए राणा की पदवी का फरमान भी मुगल दरबार से भेजा गया।
शासक बनने पर कर्णसिंह ने मुगल ढांचे पर राज्य को परगनों में बांटा।
परगनों में पटेल, पटवारी और चौधरी नियुक्त किए।
जब खुर्रम (शाहजहां) ने 1623 ई में अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया, तब उसे पिछोला के झील के महलों में पनाह दी।
कर्णसिंह के द्वारा करवाए गए निर्माण कार्यो में करण विलास, दिलखुश महल, बड़ी दरीखाना आदि में मुगल स्थापत्य का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
महाराणा जगतसिंह (1628 - 1652 ई.)
महाराणा जगत सिंह ने पिछोला झील में जग निवास नामक महल बनवाये थे।
1615 ई में उदयपुर में जगदीश/जगन्नाथराय मंदिर का निर्माण करवाया था।
मंदिर पर जगन्नाथ राय प्रशस्ति लगवाई, जिसकी रचना कृष्ण भट्ट ने की थी।
जगदीश मंदिर का वास्तुकार भाण था।
जगदीश मंदिर नागर शैली की पंचायतन शैली में बना हुआ है।
महाराणा राजसिंह (1652 - 1680 ई.)
महाराणा की गद्दीनशीनी के समय 1652 ई में शाहजहां ने राणा का खिताब, पांच हजारी जात एवं पांचहजारी सवारों का मनसब देकर हाथी एवं घोड़े भेजें।
राजसिंह के शासक बनते चित्तौड़ की मरम्मत के कार्य को पूरा करने का निश्चय किया, लेकिन मुगल सम्राट ने इसे 1615 ई की मेवाड़ मुगल संधि की शर्तों के प्रतिकूल मानते हुए इसे ढहाने के लिए 30000 सेना के साथ सादुल्ला खां को भेजा।
राजसिंह ने मुगलों से संघर्ष करना उचित न समझकर अपनी सेना को वहां से हटा लिया और मुगल सेना कंगूरे एवं बुर्ज गिरा कर लौट गई।
महाराजा अमरसिंह ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमति से विवाह किया।
औरंगजेब द्वारा 1679 ई में जजिया कर लगाने पर राजसिंह ने विरोध किया।
मुगल - मारवाड़ संघर्ष होने पर महाराणा राजसिंह ने राठौडो का साथ दिया।
राजसिंह के सेनापति और सलूंबर (उदयपुर) के रावत रतन सिंह चुंडावत का विवाह बूंदी के संग्राम सिंह की पुत्री सलह कँवर के साथ हुआ था।
विवाह के दो दिन बाद ही जब रतनसिंह को युद्ध लड़ने जाना पड़ा, तब सलह कँवर ने निशानी के रूप में अपना सिर भिजवा दिया था, यही सलह कँवर इतिहास में "हाड़ी रानी" के नाम से विख्यात है।
राजसिंह अपनी प्रजा में सैनिक और नैतिक प्रवृति को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से विजय कटकातु की उपाधि धारण की।
राजसिंह की पत्नी रामरसदे ने उदयपुर में जय बावड़ी/ त्रिमुखी बावड़ी का निर्माण करवाया।
अकाल प्रबंधन के उद्देश्य से राजसिंह ने गोमती नदी के पानी को रोककर राजसमंद झील का निर्माण करवाया।
राजसमंद झील के उत्तरी किनारे नौ चौकी नामक स्थान पर राज प्रशस्ति नामक शिलालेख लगाया।
संस्कृत भाषा में लिखित राज प्रशस्ति शिलालेख की रचना रणछोड़ भट्ट द्वारा की गई है।
प्रशस्ति 25 काले संगमरमर की शिलाओं पर खुदी हुई है यह संसार का सबसे बड़ा शिलालेख माना जाता है।
राज प्रशस्ति में मेवाड़ का एक प्रामाणिक इतिहास एवं ऐतिहासिक मुगल मेवाड़ संधि का उल्लेख मिलता है।
राजसिंह के प्रतिनिधि दाऊजी महाराज/दामोदर जी महाराज 1669 - 70 ई में मथुरा से श्रीनाथजी और द्वारकाधीश की मूर्ति लाए थे।
राजसिंह ने श्रीनाथजी को सीहाड (आधुनिक नाथद्वारा) में और द्वारकाधीश को कांकरोली (राजसमंद) में प्रतिष्ठित करवाया।
राजसिंह ने अंबिका माता मंदिर (उदयपुर) भी बनवाया।
महाराजा जयसिंह (1680 - 1698 ई.)
24 जून, 1681 ई. को औरंगजेब और महाराणा जयसिंह के बीच संधि हुई।
औरंगजेब ने पुर, मांडल और बदनौर जजिया के बदले मुगलों को सौंप दिए।
राणा जयसिंह ने गोमती नदी पर जयसमंद नामक झील का निर्माण करवाया।
महाराणा अमरसिंह द्वितीय (1698-1710 ई.)
महाराणा जयसिंह की मृत्यु उपरांत उनके पुत्र अमरसिंह द्वितीय गद्दी पर बैठे। इन्होनें प्रतापगढ़ व वागड़ को पुनः अपने अधीन किया एवं जोधपुर व आमेर को मुगलों से मुक्त किया।
महाराणा अमरसिंह ने सामंती व्यवस्था का पुनर्गठन कर राज्य के सभी सरदारों की दो श्रेणियाँ - 16 व 32 नियत की। इन्होनें 'अमरशाही पगड़ी' प्रारंभ की।
महाराणा संग्रामसिंह (1710 - 1734 ई.)
महाराणा संग्रामसिंह के समय मराठो ने मेवाड़ और राजस्थान के अन्य क्षेत्रो में धावे मारने शुरू किये।
महाराणा संग्रामसिंह ने मराठों को राजस्थान से बाहर निकालने के लिए योजना बनायी, लेकिन योजना लागू करने से पहेले ही महाराणा संग्रामसिंह की मृत्यु हो गई।
महाराणा संग्रामसिंह के शासनकाल में मेवाड़ चित्र शैली का प्रसिद्ध चित्र "कलीला दमना" का चित्रण हुआ।
महाराणा संग्रामसिंह ने उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी एवं सीसारमा में वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
महाराजा जगतसिंह द्वितीय (1734 - 1751 ई.)
मराठों को राजस्थान से बाहर निकालने के लिए जयपुर के शासक सवाई जयसिंह के द्वारा 17 जुलाई, 1734 को हुरडा (भीलवाड़ा) सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता जगतसिंह द्वितीय कर द्वारा की गयी।
जगतसिंह द्वितीय के शासनकाल में पेशवा बाजीराव प्रथम चौथ वसूलने का समझौता करने मेवाड़ आया।
जगतसिंह द्वितीय ने माधोसिंह को जयपुर का राज्य दिलाने के लिए जयपुर के उतराधिकार संघर्ष में हस्तक्षेप किया।
महाराणा अरिसिंह द्वितीय (1761-1773 ई.)
महाराणा राजसिंह द्वितीय के निस्संतान होने से महाराणा अरिसिंह द्वितीय मेवाड़ का महाराणा बना।
सरदारों ने राजमाता झाली से उत्पन्न पुत्र रत्नसिंह को मेवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर महाराणा अरिसिंह का विरोध करना शुरू कर दिया। महाराणा अरिसिंह ने बागोर के सरदार नाथसिंह एवं सलूम्बर रावत जोधसिंह की हत्या करवा दी।
देवगढ़ के रावत जसवंत सिंह ने रत्नसिंह का पक्ष मजबूत करने के लिए माधवराव सिंधिया से सहायता मांगी।
महाराणा अरिसिंह द्वितीय का उत्तराधिकारी हम्मीर द्वितीय (1773-1778 ई.) हुआ।
महाराणा भीमसिंह (1778 1828 ई.)
महाराणा भीमसिंह के शासनकाल की सबसे अधिक शर्मनाक घटना राजकुमारी कृष्णा कुमारी को विष (21 जुलाई, 1810) देकर उसका प्राण लेना था।
कृष्णा कुमारी से विवाह को लेकर जयपुर एवं जोधपुर के शासकों ने मेवाड़ पर दबाव बनाया, जिसके फलस्वरूप अमीर खां पिंडारी के दबाव में महाराणा को अपनी ही पुत्री की हत्या करनी पड़ी।
13 जनवरी, 1818 को महाराणा भीम सिंह ने अंग्रेजों से संधि कर ली।
संधि के पश्चात् फरवरी, 1818 में कर्नल टॉड एजेंट के रूप में उदयपुर में नियुक्त किया गया।
महाराणा भीम सिंह के शासनकाल में सिंधिया एवं होल्कर दोनों ही मेवाड़ में लूटमार करते थे।
मई, 1818 में सरदारों पर नियंत्रण करने के लिए उनके साथ एक कौलनामा किया गया।
महाराणा भीमसिंह के उत्तराधिकारी महाराणा जवान सिंह और महाराणा सरदार सिंह थे।
सरदार सिंह बागोर ठिकाने से गोद लिए गए थे।
महाराणा स्वरूपसिंह (1842 - 1861 ई.)
महाराणा स्वरूपसिंह, महाराणा सरदार सिंह का छोटा भाई था, जो बागोर ठिकाने से संबंध रखता था एवं सरदार सिंह के द्वारा स्वरूप सिंह को गोद लिया।
महाराणा ने जाली सिक्कों से व्यापार को नुकसान होने पर नए स्वरूपशाही सिक्कों का प्रचलन किया।
सिक्कों पर एक तरफ चित्रकूट उदयपुर और दूसरी तरफ दोस्ती लंदन लिखा हुआ था।
1857 ई क्रांति के समय स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने में महाराणा स्वरूप सिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया।
15 अगस्त, 1861 को महाराणा ने सती प्रथा पर रोक लगाने का आदेश जारी किया।
महाराणा ने डाकन प्रथा एवं समाधि प्रथा पर भी रोक लगाई।
स्वरूप सिंह के साथ पासवान एंजाबाई सती हुई, यह मेवाड़ महाराणा के साथ सती होने की अंतिम घटना थी।
महाराणा शंभूसिंह (1861 - 1874 ई.)
महाराणा शंभूसिंह बागोर ठिकाने से गोद लिया गया था।
महाराणा शंभूसिंह के सिंहासनारोहण के समय वह नाबालिग थे।।
महाराणा शंभूसिंह के सिंहासनारोहण के दौरान राज्य प्रबंध के लिए पौलिटिकल एजेंट मेजर टेलर की अध्यक्षता में रीजेंसी कौंसिल की स्थापना की गयी।
मेवाड़ में नई अदालतो की स्थापना के विरोध में नगर सेठ चंपालाल की अगुवाई में उदयपुर में हड़ताल (01 जनवरी,1864) की गई।
उदयपुर में शंभूरतन पाठशाला के नाम से एक विद्यालय 1863 ई. में खोला गया।
मेवाड़ महाराणा सज्जनसिंह (1874 - 1884 ई.)
महाराणा सज्जन सिंह बागोर ठिकाने के शक्ति सिंह का पुत्र था।
राज्यरोहण के समय नाबालिगी के कारण शासन प्रबंध रीजेंसी कौंसिल ने चलाया।
1877 ई. में लॉर्ड लिटन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार में महाराणा ने भाग लिया।
14 फरवरी 1878 को महाराणा ने अंग्रेजी सरकार के साथ नमक समझौता किया।
मेवाड़ महाराणा सज्जनसिंह को 23 नवंबर, 1881 को गवर्नर जनरल लॉर्ड रिपन ने चित्तौड़ आकर जी. सी. एस. आई. का खिताब दिया।
महाराणा सज्जन सिंह द्वारा सज्जन निवास नाम का सुंदर बाग लगवाया गया।
सज्जन सिंह के द्वारा राज्य में शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए एजुकेशन कमेटी नियुक्त कर महाराणा ने उदयपुर में हाई स्कूल, संस्कृत एवं कन्या पाठशाला और ब्रह्मपुरी आदि स्थानों पर प्राथमिक शिक्षा की पाठशाला स्थापित कराई।
उदयपुर में सज्जन यंत्रालय नाम का छापाखाना स्थापित कर सज्जन कीर्ति सुधारक नामक साप्ताहिक का प्रकाशन किया गया।
महाराणा ने अपने नाम से सज्जन अस्पताल एवं कर्नल वाल्टर के नाम से वाल्टर जनाना अस्पताल भी खोला।
महाराणा सज्जन सिंह सज्जन वाणी विलास नामक पुस्तकालय की स्थापना भी की।
महाराणा के समय राज्य में नया भू राजस्व बंदोबस्त शुरू हुआ।
महाराणा फतहसिंह (1884 - 1921 ई.)
महाराणा फतेहसिंह शिवरती के महाराज दलसिंह का पुत्र था, जो महाराणा सज्जन सिंह द्वारा गोद लिया गया।
उदयपुर में 1889 ई. में सज्जननिवास बाग में वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा की स्थापना की गयी। जिसके द्वारा राजपूतों में बहु विवाह, बाल विवाह एवं फिजूल खर्ची रोकने का प्रबंध किया गया।
ब्रिटेन के राजकुमार के कनोट के मेवाड़ आगमन पर देवाली के नए बांध की नींव राजकुमार के हाथों रखवाकर उसका नाम कनोट बांध रखा, राजकुमार के आग्रह पर इसका नाम फतेहसागर रखा।
1899 ई. मेवाड़ में भीषण अकाल पड़ा।
1903 ई. में फतेहसिंह दिल्ली दरबार में शामिल होने पहुंचे, लेकिन केसरीसिंह बारहठ के चेतावनी रा चूंगटयां पढ़कर दरबार में शामिल हुए बिना लौट आया।
महाराणा के समय बिजोलिया ठिकाने के जागीरदार के शोषण से परेशान वहां के किसानों ने आंदोलन किया।
महाराणा भूपाल सिंह (1930 - 1956 ई.)
महाराणा भूपाल सिंह मेवाड़ के सिसोदिया वंश के अंतिम शासक थे।
राजस्थान के एकीकरण के बाद भूपाल सिंह को राज्य के महाराज प्रमुख बनाए गए।
डूंगरपुर का गुहिल वंश
गुहिल वंश के सामंतसिंह के द्वारा वागड़ में राज्य स्थापित किया गया, जिसकी राजधानी "बडौदा" थी।
गुजरात के भीमदेव द्वितीय ने सामंतसिंह को वागड़ से निष्कासित करके गुहिल वंशीय विजयपाल को दिया।
सामंतसिंह के वंशज जयसिंह ने वागड़ पर पुन अधिकार स्थापित किया।
जयसिंह के उतराधिकारी सिहडदेव एवं देवपाल ने भील और परमारों को पराजित कर वागड़ राज्य की सीमा का विस्तार किया।
देवपाल का उतराधिकारी वीरसिंह ने डूंगरीयां भील को पराजित कर वागड़ की सीमा का और विस्तार किया।
वागड़ के शासक डूंगरसिंह के द्वारा राजधानी बडौदा से हटाकर डूंगरपुर को बनाई गई।
कान्हडदेव का उतराधिकारी प्रतापसिंह पाता रावल के नाम से विख्यात था।
प्रतापसिंह ने पोतला तालाब व पोतला द्वार बनवाया और परतापुर बसाया गया।
प्रतापसिंह के उतराधिकारी गोपीनाथ के शासनकाल में गुजरात के शासक अहमदशाह ने वागड़ पर आक्रमण किया और कर देने के लिए विवश किया।
कुम्भलगढ़ प्रशस्ति के अनुसार महाराणा कुम्भा ने गोपीनाथ को गुजरात के आधिपत्य से मुक्त करवाया।
गोपीनाथ ने सोमनाथ के मंदिर का निर्माण करवाया।
डूंगरपुर में गोपीनाथ ने गेपसागर का निर्माण करवाया।
गंगादास गांगेव एवं गांगा के नाम से प्रसिद्ध था।
डूंगरपुर के वनेश्वर शिलालेख के अनुसार गंगादास ने ईडर के शासक भाण को पराजित किया था।
उदयसिंह (1497 - 1527 ई.)
उदयसिंह राणा सांगा के सहयोगी के रूप में खानवा के युद्ध में लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ।
उदयसिंह ने वागड़ राज्य को दो भागो में विभाजित करके पश्चमी भाग अपने बड़े पुत्र पृथ्वीराज को दिया।
पूर्वी भाग छोटे पुत्र जगमाल को दे दिया, यह स्थान बांसवाड़ा कहलाया।
उदयसिंह के बाद वागड़ में पृथ्वीराज शासक बना।
1577 ई. में आसकरण के द्वारा मुगल अधीनता स्वीकार की गई।
आसकरण के द्वारा मुगल अधीनता स्वीकार किये जाने पर 1578 ई. में मेवाड़ के शासक प्रताप के आक्रमण का सामना करना पड़ा।
1717 ई. में रावल मानसिंह को मेवाड़ महाराणा संग्रामसिंह से सेना का खर्च देकर संधि की।
रावल शिवसिंह के शासनकाल में 1735 ई. में पेशवा बाजीराव प्रथम डूंगरपुर आया और 03 लाख रूपये वसूल किये।
रावल जसवंतसिंह द्वितीय (1808 - 1845 ई.)
जसवंतसिंह द्वितीय के शासनकाल में सिन्धी खुदा दादखां ने डूंगरपुर पर आक्रमण किया।
सर जॉन मालकम के सहयोग से 11 दिसम्बर, 1818 को जसवंतसिंह द्वितीय ने ईस्ट इण्डिया कंपनी से संधि की।
कंपनी के द्वारा 1825 ई. में जसवंतसिंह द्वितीय के जीवित रहते हुये दलपत सिंह और उदयसिंह को डूंगरपुर का शासक बनाया।
उदयसिंह (1845 - 1898 ई.)
उदयसिंह बालिग होने कारण प्रारम्भ में शासन कार्य मुंशी सफदर हुसैन ने कंपनी के निर्देशन में किया।
1857 ई. की क्रांति के समय रावल उदयसिंह डूंगरपुर का शासक था।
नीमच की आन्दोलनकारी सेना को रोकने में अंग्रेजों की सहायता की।
लक्ष्मण सिंह (1918 - 1948 ई.)
डूंगरपुर के गुहिल वंश का अंतिम शासक था।
नरेन्द्रमंडल की स्थायी समिति का बीस वर्ष तक सदस्य रहा।
यह भारतीय संविधान सभा का भी सदस्य रहा।
संयुक्त राजस्थान का उप राजप्रमुख बनाया गया।
बांसवाड़ा का गुहिल वंश
वागड़ के शासक उदयसिंह ने अपने राज्य को पूर्वी एवं पश्चिमी भागो में विभक्त कर माही नदी से पूर्व के भाग को अपने पुत्र जगमाल को दे दिया।
माही नदी से पूर्व का भाग बांसवाड़ा कहलाया, जगमाल यहाँ का प्रथम शासक बना।
महारावल प्रतापसिंह ने 1576 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की।
महारावल उम्मेदसिंह ने 25 दिसम्बर, 1818 को कप्तान जेम्स काल फील्ड (मालकम का दूत) द्वारा अंग्रेजों से संधि कर ली।
महारावल लक्ष्मणसिंह 1857 ई. की क्रांति के दौरान बांसवाड़ा का शासक था।
महारावल शंभूसिंह के शासन में शासन कार्य पौलिटिकल एजेंट के द्वारा किया गया।
पृथ्वीसिंह (1913 - 1944 ई.) अपने युवराज काल में बांसवाड़ा की सेना के साथ मानगढ़ पहाड़ी पर आक्रमण किया और गोविन्द गुरू को गिरफ्तार किया।
पृथ्वीसिंह ने बांसवाड़ा राज्य के भवनों एवं निर्माण कार्यो के नाम किंग जॉर्ज फिफ्त स्कूल, एडवर्ड धर्मशाला, कोल्विन म्युनिसिपल हॉल और कागदी नदी पर बने ब्रिज का नाम कर्जन वाईली की स्मृति में वाईली ब्रिज रखा।
महारावल चंद्रवीरसिंह (1944 - 1948 ई.)
महारावल चंद्रवीरसिंह बांसवाड़ा के गुहिल वंश के अंतिम शासक थे।
महारावल चंद्रवीरसिंह ने संयुक्त राजस्थान के विलय पत्र हस्ताक्षर करते हुये कहा कि "मैं अपने मृत्यु दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर रहा हूँ।"
प्रतापगढ़ का गुहिल वंश
प्रतापगढ़ के गुहिल वंश का प्रथम शासक मेवाड़ महाराणा मोकल का पुत्र क्षेमसिंह (1421-1433 ई.) था।
सूरजमल (1473-1530 ई.) मालवा की सेना के साथ मेवाड़ के विरुद्ध लड़ने आया, सूरजमल के द्वारा देवलिया को राजधानी बनाई गई।
सूरजमल का पुत्र बाघसिंह बहादुरशाह के चित्तौड़ घेरे (1534 ई.) के दौरान मेवाड़ की सुरक्षा के लिए मर गया।
सामंतसिंह ने 5 अक्टूम्बर, 1818 को रामचंद्र भाऊ को नीमच भेजकर कप्तान कॉलफील्ड (मालकम का प्रतिनिधि) द्वारा अंग्रेजों से संधि कर ली।
राव दलपत सिंह (1844 - 1864 ई.)
1857 ई. की क्रांति के दौरान प्रतापगढ़ का शासक राव दलपत सिंह था।
अंग्रेज भक्त होने कारण क्रांति के बाद अंग्रेजों द्वारा दो हजार रुपयों इसको खिलअत प्रदान की गई।
1862 ई. में इसको अंग्रेजों द्वारा गोद लेने का अधिकार एवं 15 तोपों की सलामी का सम्मान प्रदान किया गया।
उदयसिंह के द्वारा प्रतापगढ़ को राजधानी बनाकर यहाँ महल बनवाये।
रघुनाथ सिंह के शासनकाल में मेवाड़ और प्रतापगढ़ के मध्य सीतामाता क्षेत्र के विवाद में पौलिटिकल एजेंट ने 1891 ई. में सीतामाता क्षेत्र को प्रतापगढ़ का भाग माना।
रघुनाथ सिंह ने 1904 ई. में सालिमशाही रूपये की जगह "कलदार" की शुरुआत की।
रामसिंह प्रतापगढ़ के गुहिल वंश का अंतिम शासक था।
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