Sunday, September 01, 2024

राजस्थान का कच्छवाह वंश का इतिहास | Kachwaha Dynasty of Amer (Jaipur)

राजस्थान CET स्नातक स्तर परीक्षा से संबंधित 1857 ई. की क्रांति के बारे में विस्तृत विवरण

  • राजस्थान का कच्छवाह वंश का इतिहास | Kachwaha Dynasty of Amer (Jaipur)

  • 1137 ई. में दूल्हराय ने दौसा के बडगुर्जरों को परास्त कर ढूंढाड़ में कच्छवाह वंश का नवीन राज्य स्थापित किया था।
  • सूर्यमल मिसण के अनुसार कूर्म नामक रघुवंशी शासक की संतति होने से ये कूर्मवंशीय कहलाने लगे।
  • डॉ. ओझा के अनुसार इनका मूलपुरुष कच्छवाहा था।
  • दूल्हराय ने ही जमवारामगढ़ में मीणों को परास्त कर अपनी राजधानी बनाया था।
  • कच्छवाह वंश की प्रथम राजधानी दौसा, दूसरी जमवारामगढ़, तीसरी आमेर और चौथी राजधानी जयपुर रही थी।
  • कच्छवाह वंश के नरु से नरुका और शेखा से शेखावत शाखाएँ निकली थी, जिस भाग शेखा ने राज्य स्थापित किया, शेखावाटी नाम से प्रसिद्ध हुआ।
  • कच्छवाह वंश के शासक राजदेव ने 1237 ई. में आमेर में प्रसिद्ध कदमी महलों का निर्माण करवाया, जिनमें बनी छतरी में कच्छवाह शासको का राजतिलक होता था।
  • चंद्रसेन का उत्तराधिकारी पृथ्वीराज 1527 ई. में खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की ओर से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ था।
  • 1207 ई. में काकिलदेव ने आमेर में मीणों को परास्त कर आमेर को कच्छवाहा वंश की राजधानी स्थापित की।

  • धुल्हेराय
    • 1137 ई. में दूल्हराय ने दौसा के बडगुर्जरों को परास्त कर ढूंढाड़ में कच्छवाह वंश का नवीन राज्य स्थापित किया था।
    • दूल्हराय ने ही जमवारामगढ़ में मीणों को परास्त कर अपनी राजधानी बनाया था।

  • 1207 ई. में काकिलदेव ने आमेर में मीणों को परास्त कर आमेर को कच्छवाहा वंश की राजधानी स्थापित की।

  • भारमल
    • भारमल मुगल अधीनता स्वीकार करने वाला पहला राजपूत शासक था
    • मजनू खां ने दिसंबर, 1556 में अकबर और भारमल की मित्रता कार्रवाई
    • 20 जनवरी 1562 में सांभर में ही अपने पुत्र भगवान दास और पौत्र मानसिंह सहित भारमल ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली
    • जनवरी, 1562 में अजमेर से लौटते समय सांभर में भारमल ने पुत्री हरकूबाई या मानमती का विवाह अकबर के साथ किया
    • जहांगीर हरकू भाई का पुत्र था, इस कारण भारमल मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाला पहला राजपूत शासक था
    • अकबर ने भारमल को 5000 का मनसब एवं अमीर उल उमरा उपाधि प्रदान की थी

  • भगवंतदास
    • भगवंतदास भारमल का पुत्र था
    • अकबर ने भगवंतदास को टीका भिजवाया और 5000 का मनसब एवं अमीर उल उमरा की पदवी दी
    • भगवंतदास ने पुत्री मानबाई का विवाह जहांगीर के साथ किया, खुसरो मानबाई से उत्पन्न जहांगीर का पुत्र था
    • 1583 से 1598 ई तक पंजाब के सूबेदार के रूप में कार्य किया
    • 1589 ई. में लाहौर में भगवंतदास की मृत्यु हुई

  • मानसिंह
    • मानसिंह अकबर के नवरत्नों में शामिल था
    • अकबर ने मानसिंह को फर्जन्द की उपाधि व 7000 का मनसब दिया
    • मानसिंह ने काबुल, बंगाल, बिहार आदि के सूबेदार के रूप में कार्य किया
    • मानसिंह ने बिहार में मानपुर और बंगाल में अकबरपुर/राजमहल की स्थापना की और रोहतासगढ़ में सुंदर महलों का निर्माण करवाया
    • मानसिंह ने बंगाल के शासक केदारनाथ को परास्त करके बंगाल से शीलादेवी की मूर्ति लाकर, उसे आमेर में प्रतिष्ठित करवाया
    • मानसिंह के पुत्र जगत सिंह की बंगाल अभियान के दौरान मृत्यु होने पर उसकी माता कनकावती ने जगत सिंह की स्मृति में आमेर में जगत शिरोमणि मंदिर का निर्माण करवाया, मूर्ति मानसिंह चित्तौड़ के मीरा मंदिर से लाए थे
    • मानसिंह के द्वारा अकबर एवं जहांगीर मुगल सम्राटों की सेवा की गई
    • अकबर के रणथम्भोर अभियान में सुरजन हाड़ा को मुगल अधीनता स्वीकार करवाने में मानसिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई
    • 1573 ई. में मानसिंह महाराणा प्रताप के पास मुगलों से संधि करने का दूसरा प्रस्ताव लेकर गए
    • मानसिंह की मृत्यु 6 जुलाई 1614 में इलिचपुर में हुई

  • मिर्जा राजा जयसिंह
    • राजा जयसिंह प्रथम को तीन मुगल सम्राट जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब की सेवा में रहने का अवसर प्राप्त हुआ
    • शाहजहां ने जयसिंह प्रथम को मिर्जा राजा की पदवी देकर शुजा के साथ कंधार भेजा
    • शिवाजी और जयसिंह प्रथम के मध्य संधि को पुरंदर की संधि (1665 ई.) के नाम से जाना जाता है
    • जयसिंह प्रथम के दरबार में प्रसिद्ध बिहारी कवि था, जयसिंह के द्वारा उसके एक-एक दोहे पर एक-एक स्वर्ण मुद्रा प्रदान की
    • 2 जुलाई 1667 को बुरहानपुर में सवाई जयसिंह की मृत्यु हो गई

  • सवाई जयसिंह द्वितीय
    • जयसिंह प्रथम की तुलना में जयसिंह द्वितीय की वीरता और वाक्पटुता के कारण औरंगजेब ने सवाई जयसिंह नाम रख दिया
    • 1707 ई के उत्तराधिकार युद्ध में जयसिंह ने आजम का पक्ष लिया, लेकिन युद्ध में मुअज्जम ने विजय प्राप्त की
    • मुअज्जम जो बहादुरशाह के नाम से शासक बना, आमेर पहुंचकर विजयसिंह को शासक घोषित कर दिया और आमेर का नाम इस्लामाबाद या मोमीनाबाद रख दिया
    • 1725 ईस्वी में सवाई जयसिंह ने नक्षत्रो की शुद्ध सारणी बनवाई और इसका नाम जीज मोहम्मदशाही रखा
    • सवाई जयसिंह के द्वारा जयसिंह कारिका नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की गई
    • सवाई जयसिंह ने जयपुर, दिल्ली, मथुरा, उज्जैन और बनारस में वेधशालाएं बनवाई, जयपुर का जंतर मंतर सबसे बड़ा है
    • जयसिंह ने विद्याधर नामक बंगाली वास्तुशास्त्र के ज्ञाता से एक नगर का नक्शा बनवाकर 18 नवम्बर, 1727 को जयपुर नगर की स्थापना करवाई गई।
    • सवाई जयसिंह अंतिम हिंदू शासक था, जिसने अश्वमेध यज्ञ संपन्न करवाएं
    • 1734 ईस्वी में सवाई जयसिंह ने जयपुर में नाहरगढ़ या सुदर्शन गढ़ किले का निर्माण करवाया
    • सवाई जयसिंह ने जयगढ़ में जयबाण तोप का निर्माण करवाया, जो एशिया की सबसे बड़ी तोप मानी जाती है
    • सवाई जयसिंह ने चंद्रमहल, सिसोदिया रानी का महल व जलमहल का निर्माण करवाया

  • ईश्वरीसिंह
    • ईश्वरीसिंह सवाई जयसिंह का ज्येष्ठ पुत्र था
    • टोंक के राजमहल के युद्ध में जयपुर की राजगद्दी को लेकर उसके सौतेले भाई माधोसिंह के साथ इसका संघर्ष हुआ
    • टोंक के राजमहल युद्ध में विजय के उपलक्ष में ईश्वरलाट का निर्माण करवाया गया
    • मराठौ की सहायता से माधव सिंह ने बगरू के युद्ध (1748 ई.) में ईश्वरीसिंह को परास्त कर दिया
    • होल्कर का जयपुर पर दबाव बढ़ने पर ईश्वरीसिंह ने 1750 ई. में आत्महत्या कर ली

  • माधोसिंह प्रथम
    • सवाई माधोसिंह प्रथम मेवाड़ राजकुमारी चंद्रकुंअरी एवं सवाई जयसिंह का पुत्र था
    • 1761 ई. में भटवारा के युद्ध  में कोटा के शासक शत्रुसाल से परास्त हुआ
    • 1763 ई. में सवाई माधोसिंह प्रथम ने सवाई माधोपुर की स्थापना की
    • चाकसू में शीतला माता मंदिर का निर्माण करवाया
    • नाहरगढ़ दुर्ग में एक जैसे 9 महल बनवाये

  • सवाई प्रतापसिंह
    • सवाई प्रताप सिंह के शासनकाल को संगीत का स्वर्ण काल कहा जाता है
    • 1787 ई. में जयपुर के तुंगा में सवाई प्रताप सिंह और महादजी सिंधिया के मध्य युद्ध हुआ
    • 1799 ई. में जयपुर में 5 मंजिला हवामहल का निर्माण करवाया गया, हवामहल भगवान विष्णु को समर्पित है
    • हवामहल में 953 खिड़कियां है, हवामहल का वास्तुकार उस्ताद लालचंद्र था
    • सवाई प्रताप सिंह ब्रिजनिधि उपनाम से कविताएं लिखता था, इसकी कविताओं के संग्रह को ब्रिजनिधि ग्रंथावली के नाम से जाना जाता है
    • सवाई प्रताप सिंह के दरबार में 22 विद्वान रहते थे, जिन्हें  प्रताप बाईसी/गंधर्व बाईसी कहा जाता था
    • सवाई प्रताप सिंह के संगीत गुरु चाँदखां थे, सवाई प्रताप सिंह के द्वारा गुरू को बुद्ध प्रकाश की उपाधि दी
    • सवाई प्रताप सिंह ने राधा गोविंद संगीत सार नामक ग्रंथ लिखा

  • सवाई जगतसिंह
    • सवाई जगतसिंह ने 15 अप्रैल 1818 को अंग्रेजों से संधि कर उनकी अधीनता स्वीकार की।
    • रसकपुर नामक नर्तकी से संबंध होने के कारण इसे जयपुर का बदनाम शासक भी माना जाता है।
    • मेवाड़ राजकुमारी कृष्णा से विवाह के मामले को लेकर 13 मार्च, 1807 को गिंगोली (नागौर) के युद्ध में मारवाड़ के शासक मानसिंह को परास्त किया।

  • सवाई राम सिंह द्वितीय 
    • राज्याभिषेक के समय सवाई राम सिंह द्वितीय अल्पव्यस्क होने के कारण शासन पर रीजेंसी कौंसिल के अध्यक्ष मेजर लुडलो का नियंत्रण रहा।
    • लूडलों ने राजस्थान में समाधि प्रथा और कन्या क्रय विक्रय पर सर्वप्रथम जयपुर रियासत में प्रतिबंध लगाया।
    • 1857 की क्रांति के समय सवाई राम सिंह द्वितीय ने अंग्रेजों का सहयोग किया, इसके उपलक्ष में अंग्रेजों द्वारा सितार ए हिंद की उपाधि प्रदान की गई।
    • सवाई राम सिंह द्वितीय के द्वारा जयपुर में मदरसा हुनरी की स्थापना की गई, जिसका माधोसिंह द्वितीय ने नाम बदलकर राजस्थान स्कूल आफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स कर दिया।
    • ब्रिटिश शासन एडवर्ड पंचम के जयपुर आगमन पर राम सिंह ने 1868 ईस्वी में जयपुर को गुलाबी रंग से पुतवाया।
    • सवाई राम सिंह द्वितीय ने 1876 ईस्वी में पोथिखाना और प्रिंस अल्बर्ट के जयपुर आगमन पर अल्बर्ट हॉल संग्रहालय की स्थापना करवाई गयी।
    • सवाई राम सिंह द्वितीय ने जयपुर में राम प्रकाश थिएटर, रामनिवास बाग, रामगढ़ बांध, महाराजा स्कूल व संस्कृत स्कूल की स्थापना की।

  • सवाई माधोसिंह द्वितीय 
    • सवाई माधोसिंह द्वितीय के शासनकाल में राजस्थान के जयपुर में सर्वप्रथम 1904 ई. में डाक टिकट और पोस्टकार्ड की शुरुआत हुई।
    • बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए मदनमोहन मालवीय को पांच लाख रुपयों का अनुदान दिया।
    • चंद्रमहल में प्रसिद्ध मुबारक महल का निर्माण करवाया, जो मुगल - राजपूत एवं यूरोपियन स्थापत्य कला का नमूना है।
    • ब्रिटिश शासन एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक के अवसर पर चांदी के दो बड़े कलशो में गंगाजल लेकर लंदन गया।
    • यह चांदी के कलश वर्तमान में मुबारक महल में रखे गए हैं, जो दुनिया के सबसे बड़े चांदी के पात्र माने जाते है।

  • सवाई मानसिंह द्वितीय 
    • कच्छवाहा वंश के अंतिम शासक सवाई मानसिंह द्वितीय थे।
    • राजमाता गायत्री देवी सवाई मानसिंह द्वितीय की पत्नी थी।
    • 1943 ई. में जयपुर में महारानी गायत्री देवी स्कूल का निर्माण करवाया गया।
    • मानसिंह 1949 से 1956 ई तक राजस्थान के राज्य प्रमुख पद पर रहे।
    • मानसिंह पोलो का प्रसिद्ध खिलाड़ी रहा है।
    • सवाई मानसिंह द्वितीय के प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माइल को आधुनिक जयपुर का निर्माता कहा जाता है।
    • मानसिंह की मृत्यु 24 जून 1970 में लंदन में पोलो खेलते समय घोड़े से गिरकर हुई।
    • सवाई मानसिंह द्वितीय की पत्नी गायत्री देवी राजस्थान में प्रथम महिला लोकसभा सदस्य रही है।

RAJASTHAN Me 1857 ki Kranti | राजस्थान में 1857 ई. की क्रांति

राजस्थान CET स्नातक स्तर परीक्षा से संबंधित 1857 ई. की क्रांति के बारे में विस्तृत विवरण

  • राजस्थान में क्रांति का प्रारम्भ 28 मई, 1857 को नसीराबाद सैनिक छावनी की 15वीं नेटिव इंफेंट्री के सैनिकों ने की।
  • भारत में 10 मई, 1857 को मेरठ की छावनी में भारतीय सैनिको के विद्रोह में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति की शुरुआत की गई।
  • 1857 की क्रांति के दौरान राजपूताना रेजीडेंसी का प्रशासन उत्तर पश्चिमी प्रान्त के लेफ्टिनेंट गवर्नर कॉल्विन के नियंत्रण में था, जिसका मुख्यालय आगरा था
  • राजपूताना रेजीडेंसी में एजेंट टू गवर्नर जनरल (AGG) जॉर्ज पैट्रिक लारेंस थे
  • इसका कार्यालय अजमेर था 
  • ए.जी.जी. के अधीन कई पॉलिटिकल एजेंट थे, जो राज्यों में नियुक्त थे
  • 1857 की क्रांति के दौरान राजस्थान में नियुक्त पॉलिटिकल एजेंटस की स्थिति निम्नानुसार थी - 
    • ​कैप्टन सी.एल.शावर्स - उदयपुर
    • विलियम ईडन - जयपुर
    • माक मेसन - जोधपुर 
    • मेजर बर्टन - कोटा
    • मेजर निक्सन - भरतपुर 
  • 1857 की क्रांति में कोटा में विद्रोह 15 अक्टूबर, 1857 दिनांक को हुआ।
  • कोटा में विद्रोह कोटा राज्य के भूतपूर्व वकील जयदयाल और सेना में रिसालदार मेहराब खान के नेतृत्व में किया गया
  • विद्रोहियों ने पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन, उसके 2 पुत्रो और एजेंसी के सर्जन डॉ. सेडलर की हत्या कर दी
  • कोटा विद्रोह के समय कोटा के शासक महाराजा रामसिंह थे
  • 30 मार्च, 1858 को अंग्रेज सेना ने कोटा को विद्रोहियों से मुक्त करवा लिया
  • जयदयाल और मेहराब खान को एजेंसी भवन के निकट पेड़ पर फांसी दी गई
  • मेजर बर्टन की हत्या की जांच के लिए लार्ड राबर्ट्स की अध्यक्षता में में एक जाँच आयोग का गठन किया गया
  • कोटा महाराव को तोपों की सलामी की संख्या 17 से घटाकर 13 कर दी गई

  • जोधपुर की एरनपूरा छावनी में 21 अगस्त, 1857 में जोधपुर लीजन के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया
  • एरिनपुरा छावनी के सैनिकों के द्वारा ही विद्रोह के दौरान "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी" का नारा दिया गया।
  • 1835 ई. में अंग्रेजों द्वारा जोधपुर लीजन का गठन किया गया।
  • जोधपुर लीजन का मुख्यालय एरिनपुरा में रखा गया।
  • देवली छावनी -  कोटा कंटिजेंट  
  • खेरवाड़ा छावनी - मेवाड़ भील कौर 
  • नसीराबाद छावनी - बंगाल नैटिव इन्फेंट्री के सैनिक थे।
  • राजस्थान में 1857 की क्रांति के समय 06 सैनिक छावनियाँ थी।
  • 06 सैनिक छावनियाँ  - नीमच, नसीराबाद, देवली, खेरवाड़ा, ऐरनपुरा और ब्यावर।
  • सैनिक छावनियों में अंग्रेज सैनिक थे, मगर अधिकांश सैनिक भारतीय थे।
  • छावनियों में सबसे शक्तिशाली छावनी नसीराबाद थी, जिसमे बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक थे।

  • आउवा के किले में सुगाली माता जी की मूर्ति प्रतिष्ठापित थी।
  • कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) के नेतृत्व में विद्रोहीयों की सैन्य टुकड़ी द्वारा जोधपुर की राजकीय सेना को बिथोरा नामक स्थान पर दिनांक 8 सितम्बर, 1857 को पराजित किया था।
  • 18 सितम्बर, 1857 को चेलावास नामक स्थान पर ए.जी.जी. लॉरेन्स की सैन्य टुकड़ी कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) के नेतृत्व में विद्रोहीयों की सैन्य टुकड़ी से पराजित होकर पीछे हट गई, इस युद्ध में जोधपुर के पॉलिटिक्ल एजेंट माक मेसन मारा गया
  • 1857 की क्रांति के दौरान कर्नल होम्स के नेतृत्व में एक सेना के द्वारा दिनांक 20 जनवरी, 1858 को आउवा को चारों तरफ से घेर लिया गया।
  • जीत की आशा न देखकर कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) बचकर निकल गया।
  • किलेदार के विश्वासघात के कारण 24 जनवरी, 1858 को अंग्रेजी सेना ने किले पर अधिकार कर लिया।
  • सुगाली माता की मूर्ति को होम्स उठाकर अजमेर ले गया, जिसे अजमेर म्यूजियम में रखा गया हैं।
  • सुगाली माता के 10 सर और 54 हाथ हैं।

  • 15 वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री अजमेर में कम्पनी खजाने और गोला बारूद की सुरक्षा में तैनात थी।
  • 10 मई, 1857 को मेरठ की छावनी में भारतीय सैनिको के विद्रोह के उपरांत ए.जी.जी लारेंस को बंगाल इन्फेंट्री पर विश्वास नही था, क्योंकि यह सैनिक मेरठ से अजमेर आये थे।
  • उक्त कारण अजमेर की सुरक्षा का जिम्मा 15 वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री से ले लिया गया था, इस सैनिक टुकड़ी को नसीराबाद भेज दिया गया
  • इस कारण 15 वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सैनिक इस घटना से आहत थे
  • अजमेर की सुरक्षा के लिए मेर रेजिमेंट तैनात की गयी और डीसा से अंग्रेज सेना बुलायी गयी
  • 28 मई, 1857 को नसीराबाद सैनिक छावनी की 15वीं नेटिव इंफेंट्री के सैनिकों ने विद्रोह शुरू कर दिया और 2 अंग्रेज अधिकारियों - मेजर स्पोटिस वुड एवं कर्नल न्यूबारी की हत्या कर दी गयी।
  • 1857 की क्रांति के दौरान धौलपुर का शासक भगवंत सिंह था।
  • धौलपुर का शासक अंग्रेजों का समर्थक था।
  • धौलपुर के शासक द्वारा मथुरा और करौली में विद्रोहियों को दबाने के लिए सेना भेजी और धौलपुर आने वाले अंग्रेजों को सुरक्षित आगरा पहुँचाया।
  • तख्त सिंह
    • जोधपुर के महाराजा तख्त सिंह पूर्ण निष्ठा और सक्रियता से 1857 की क्रांति को दबाने में अंग्रेजों का सहयोग किया।
    • जोधपुर की राजकीय सेना विद्रोहियों के दमन के लिए भेजी गई
  • राम सिंह
    • रामसिंह 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम के समय जयपुर के महाराजा थे।
    • रामसिंह भी क्रांति के दौरान अंग्रेजों के प्रति पूर्ण वफादार थे।
    • क्रांति के दौरान जयपुर में लूटपाट या विद्रोह की कोई घटना नही हुई।
  • मदनपाल
    • मदनपाल 1857 ई. की क्रांति के समय करौली का शासक था।
    • मदनपाल भी विद्रोह के दौरान अंग्रेजभक्त बना रहा।
    • ए.जी.जी ने करौली के शासक की तोपों की राजपत्री की संख्या 17 कर दी थी।
  • 1857 ई. की क्रांति के दौरान बीकानेर का शासक सरदार सिंह राजस्थान के शासकों में एकमात्र शासक थे, जिन्होंने विद्रोहियों को दबाने के स्वयं अभियान का नेतृत्व किया
  • सरदार सिंह 5000 सैनिक लेकर पंजाब के होसी, सिरसा और हिसार जिलो में गया
  • अंग्रेज सरकार इनकी सेवा से प्रसन्न होकर टीबी परगने के 41 गाँव दिए
  •  दलपत सिंह
    • 1857 ई. की क्रांति के समय प्रतापगढ़ के शासक दलपत सिंह थे
    • दलपत सिंह ने विद्रोहियों को दबाने के लिए अपनी सेना नीमच भेजी
    • अपने राज्य से विद्रोहियों को गुजरने नही दिया
  • नवाब वजीरूद्दौला
    • 1857 ई. की क्रांति के समय टोंक के नवाब वजीरूद्दौला थे
    • नवाब वजीरूद्दौला भी अंग्रेज समर्थक था, लेकिन उसकी सेना ने विद्रोहियों का साथ दिया
    • टोंक के नवाब के मामा मीर आलमखां अंग्रेज विरोधी था, उसने खुलकर अंग्रेजों का विरोध किया और राज्य की सेना के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया
  • रणजीत सिंह 
    • 1857 ई. की क्रांति के समय जैसलमेर के महारावल रणजीत सिंह थे
    • रणजीतसिंह भी अंग्रेजी सेना के प्रति पूर्ण निष्ठा के साथ सहयोग प्रदान किया था
  • 18 सितम्बर, 1857 को चेलावास नामक स्थान पर ए.जी.जी. लॉरेन्स की सैन्य टुकड़ी कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) के नेतृत्व में विद्रोहीयों की सैन्य टुकड़ी से पराजित होकर पीछे हट गई।
  • इस युद्ध में जोधपुर के पॉलिटिक्ल एजेंट माक मेसन मारा गया।
  • चेलावास के युद्ध को राजस्थान साहित्य में गोरे - कालो का युद्ध कहा गया है
  • स्वतंत्रता संग्रामियों ने पॉलिटिक्ल एजेंट माक मेसन का सर धड़ से अलग कर आउवा में घुमाया और उसे किले के दरवाजे पर टांग दिया।
  • बिथोरा का युद्ध
    • कुशाल सिंह (आउवा का ठाकुर) के नेतृत्व में विद्रोहीयों की सैन्य टुकड़ी द्वारा जोधपुर की राजकीय सेना को बिथोरा नामक स्थान पर दिनांक 8 सितम्बर, 1857 को पराजित किया था।
  • कोटा का विद्रोह
    • ​1857 की क्रांति में कोटा में विद्रोह 15 अक्टूबर, 1857 दिनांक को हुआ।
    • कोटा में विद्रोह कोटा राज्य के भूतपूर्व वकील जयदयाल और सेना में रिसालदार मेहराब खान के नेतृत्व में किया गया।
    • विद्रोहियों ने पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन, उसके 2 पुत्रो और एजेंसी के सर्जन डॉ. सेडलर की हत्या कर दी।
    • कोटा विद्रोह के समय कोटा के शासक महाराजा रामसिंह थे।
  • नसीराबाद का विद्रोह
    • राजस्थान में क्रांति का प्रारम्भ 28 मई, 1857 को नसीराबाद सैनिक छावनी की 15वीं नेटिव इंफेंट्री के सैनिकों ने की।

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताए | Rajasthan Ki Prachin Sbhaytaye

 राजस्थान CET स्नातक स्तर परीक्षा से संबंधित प्राचीन सभ्यताओं के बारे में विस्तृत विवरण

कालीबंगा सभ्यता 

  • कालीबंगा में रक्षा प्राचीर से दुर्ग तथा निचले नगर के घिरे होने का साक्ष्य प्राप्त हुआ हैं।
  • इसका निर्माण कच्ची मिट्टी की ईंटो से किया गया था
  • कालीबंगा वर्तमान में राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के किनारे स्थित हैं
  • सर्वप्रथम 1952 में अमलानंद घोष के द्वारा खोज की गई और तत्पश्चात 1961 से 1964 के मध्य श्री बी.बीलालश्री बीकेथापर एवं श्री एमडीखरे द्वारा उत्खनन कार्य करवाया गया
  • यहाँ उत्खनन 05 स्तरों तक किया गया
  • कालीबंगा सुव्यवस्थित नगर योजना के अनुसार बसा हुआ था
  • समकोण पर कटती सड़के एवं सड़कों के किनारे नालियां विकास की परिचायक थी 
  • कालीबंगा से जूते हुए खेत के प्रतीक मिलते हैं 
  • कालीबंगा में भूकंप आने के प्राचीनतम प्रतीक भी मिलते हैं 
  • कालीबंगा की लिपी सिन्धु लिपी के समान ही थी, जिसे दायें से बायें लिखा गया था 


बैराठ की सभ्यता

  • बैराठ वर्तमान में राजस्थान के कोटपूतली बहरोड़ जिले में स्थित हैं
  • बैराठ सभ्यता का उत्खनन 1937 में दयाराम साहनी के द्वारा करवाया गया, तत्पश्चात 1962-63 में नीलरत्न बनर्जी एवं कैलाशनाथ के निर्देशन में उत्खनन कार्य करवाया गया
  • बैराठ की गणेशबीजक एवं भीम की डूंगरी से प्राचीन शैल चित्रों के प्रमाण प्राप्त हुये है
  • यहाँ चाँदी की आठ 'पंचमार्क' और इन्डोग्रीक शासकों की 28 मुद्राएँ मिली हैं
  • बैराठ से अशोक स्तम्भ एवं एक गोल मंदिर के अवशेष भी मिले हैं
  • बैराठ के निकट से ही अशोक का भाब्रू अभिलेख प्राप्त हैं, जो अशोक को बोद्ध धर्मानुयायी सिद्ध करता हैं

आहड सभ्यता


  • आहड़ राजस्थान के उदयपुर जिले में आहड़ नदी (बेडच) के तट पर स्थित है
  • यहाँ उत्खनन में चार हजार वर्ष पुरानी प्रस्तर धातु युगीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुये है
  • इसका उत्खनन सर्वप्रथम 1953 में अक्षय कीर्ति व्यास के द्वारा किया गया
  • यहाँ उत्खनन में बस्तियों के आठ स्तर मिले हैं
  • यहाँ मकानों में एक से अधिक चूल्हे मिलना संयुक्त परिवार प्रणाली की विद्यमानता को प्रकट करते हैं
  • आहड़ सभ्यता से मिले मृदभांड इसको लाल काले मृदभांड वाली संस्कृति का प्रमुख केंद्र सिद्ध करते हैं
  • आहड़ का दूसरा नाम ताम्रवती नगरी भी मिलता हैं  जो यहाँ तांबे के ओजारो एवं उपकरणों के अत्यधिक प्रयोग का सूचक हैं
  • तोल के बाट व माप मिलना यहाँ वाणिज्य व्यापार की उन्नति के संकेत करता हैं 

बालाथल सभ्यता


  • बालाथल वर्तमान में उदयपुर की वल्लभनगर तहसील के बालाथल ग्राम में स्थित हैं
  • बालाथल सभ्यता का उत्खनन प्रोवी.एनमिश्र के निर्देशन में 1993 . में किया गया हैं
  • बालाथल में 1800 ईसा पूर्व के लगभग ताम्र पाषाणीक सभ्यता तथा 600 ईसा पूर्व लोहयुगीन सभ्यता आबाद होने का अनुमान हैं
  • उत्खनन में लोहे के ओजार प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुये हैं
  • लोहा गलाने की पांच भट्टियों के अवशेष भी प्राप्त हुये हैं
  • लोह युग में यहाँ नलकूप होने के भी संकेत मिले हैं
  • उत्खनन में मिट्टी से बनी सांड की आकृतियां मिली है, जिनका प्रयोग संभवतः पूजा के लिए किया जाता था

गणेश्वर सभ्यता


  • गणेश्वर सभ्यता वर्तमान में राजस्थान के नीम का थाना जिले में कांटली नदी के उदगम पर स्थित हैं।
  • इसका उत्खनन रत्नचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में हुआ हैं।
  • यहाँ से 2800 ईसा पूर्व की सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुये हैं।
  • गणेश्वर से प्रचुर मात्रा में ताम्र आयुध व उकरण मिले हैं जो इसे ताम्रयुगीन सभ्यताओं में प्राचीनतम सिद्ध करते हैं।
  • गणेश्वर भारत की ताम्र सभ्यताओ की जननी माना जाता हैं।
  • गणेश्वर में मकानों के लिए पत्थर का प्रयोग करने के साक्ष्य मिलते हैं।
  • बस्ती को बाढ़ से बचाने के लिए पत्थर के बाँध भी बनाये जाते थे।

Thursday, August 17, 2023

महात्मा गाँधी सेवा प्रेरक भर्ती 2023 का ऑनलाइन आवेदन कैसे भरे | How to Fill Online Application form of Mahatma Gandhi Seva Prerak Bharti 2023 | Govt Jobs in Rajasthan


महात्मा गांधी सेवा प्रेरक भर्ती 2023 

महात्मा गाँधी सेवा प्रेरक भर्ती 2023 का ऑनलाइन आवेदन फॉर्म कैसे भरे

Govt Jobs in Rajasthan

राजस्थान सरकार के शान्ति एवं अहिंसा विभाग द्वारा राज्य के सभी जिलों के समस्त ब्लाॅकों के सभी राजस्व ग्रामों एवं शहरी क्षेत्र के सभी वार्डो में 50 हजार महात्मा गांधी सेवा प्रेरकों को एक वर्ष के लिए नियत मानदेय पर लिये जाने हेतु ऑनलाइन आवदेन पत्र आमंत्रित किये जा रहे है।


 

शैक्षणिक योग्यता/अर्हता :- महात्मा  गांधी  सेवा  प्रेरकों  के चयन  हेतु  न्यूनतम  शैक्षणिक योग्यता मान्यता प्राप्त बोर्ड से 10+2 अथवा समकक्ष होगी। 

चयन हेतु प्राथमिकता दी जाने का विवरण - 

1. महात्मा  गांधी  दर्शन  प्रशिक्षण  शिविर  में  भाग  लेने  वाले  प्रमाण  पत्र  धारक, 

2. Scout Guide,

3. NCC/NYK Certificate धारी, 

4. सुरक्षा सखी, 

5. पुलिस मित्र, 

6. पूर्व बजट घोषणा में चयनित महात्मागांधी सेवा प्रेरक एवं 

7. महिला स्वयं सहायता समूह (SHG) की सदस्य 

चयनित  महात्मा  गांधी  सेवा  प्रेरकों  का  कार्यकाल  एक  वर्ष  होगा  तथा  राज्य  सरकार  द्वारा कार्यकाल घटाया/बढाया जा सकेगा।

आयु सीमा:- दिनांक 01.01.2024 को न्यूनतम 21 वर्ष एवं अधिकतम 50 वर्ष होनी चाहिए। 

मानदेय:- महात्मा  गांधी  सेवा  प्रेरक को  4500 रू  प्रतिमाह  नियत मानदेय देय  होगा। इसके अतिरिक्त कोई अन्य भत्ते आदि देय नही होंगे।

आवेदन अवधि:- अभ्यर्थियों द्वारा ऑनलाईन आवेदन पत्र दिनांक 16.08.23 से दिनांक 29. 08.2023 रात्रि 12.00 बजे तक भरा जा सकता है। 

आवेदन फीस :- आवेदन फॉर्म भरने का कोई शुल्क देय नहीं हैं (फॉर्म की फीस फ्री हैं) 

आवेदनः- आवेदन  पत्र  ऑनलाईन  भरे  जाऐगें। आवेदक अपनी ग्राम  पंचायत/राजस्व ग्राम/शहरी वार्ड के लिए ही आवेदन कर सकेगा।  एकाधिक स्थानों हेतु किये गये आवेदन अस्वीकार कर दिये जायेगे।

चयन प्रक्रिया:- महात्मा गांधी सेवा प्ररेक हेतु प्राप्त पूर्ण भरे ऑनलाइन आवेदन पत्रों में से, वांछित योग्यता/अर्हता धारित अभ्यर्थियों का  योग्यता एवं अन्य समस्त मूल दस्तावेजो का सत्यापन/जांच तथा साक्षात्कार  कर,  उपखण्ड स्तरीय समिति/साक्षात्कार समिति द्वारा, जिला स्तरीय समिति को अपनी अनुशंषा प्रेषित की जायेगी। जिसके आधार पर जिला स्तरीय समिति  द्वारा  प्रत्येक  राजस्व  ग्राम/शहरी वार्डवार अन्तिम अनुमोदित  सूची  से  विभाग  द्वारा चयनित अभ्यर्थियों को उनके क्षेत्र में महात्मा गांधी सेवा प्रेरक लगाया जावेगा।

आवेदक द्वारा जिस राजस्व ग्राम/वार्ड (शहरी क्षेत्र) के लिए आवेदन किया है, आवेदक उस राजस्व ग्राम/वार्ड (शहरी क्षेत्र) का वह स्थानीय निवासी होना चाहिए।

आगंनबाडी कार्यकर्ताओं के चयन के प्रावधानों के अनुरूप ही, जिन  राजस्व ग्रामों/शहरी वार्डों के कवरेज क्षेत्रों में, जनसंख्या का 50 प्रतिशत या अधिक अनुसूचित जाति/जनजाति/अल्पसंख्यक आदि का है, तो उसी वर्ग के आवेदक का अनिवार्यतः चयन किया  जावेगा। तदानुसार  आरक्षित  वर्ग  हेतु  जाति  प्रमाण  पत्र  प्रस्तुत  किया  जाना  अनिवार्य होगा।

साक्षात्कार के समय वांछित दस्तावेज़/प्रमाण पत्रों का सत्यापनः-  अभ्यर्थियों द्वारा ऑनलाईन आवेदन पत्र में वर्णित शैक्षणिक योग्यता  एवं  अन्य अर्हता संबंधित समस्त प्रमाण पत्र/दस्तावेज, साक्षात्कार के समय मूल प्रति के रूप में प्रस्तुत किये जाने होंगे। 

 How to Fill Online Application form of Mahatma Gandhi Seva Prerak Bharti 2023 

ऑनलाईन  आवेदन करने के लिए निम्नलिखित अधिकारिक वेबसाइट पर क्लिक करे -----

Click here 

ऑनलाईन  आवेदन  की  प्रक्रिया:-  विभाग द्वारा आवेदन online Application Form द्वारा लिये जाएंगे जिन्हें राज्य के ई-मित्र कियोस्क/जन  सुविधा  केन्द्र  के  माध्यम  से  भरा  जा सकता  है। ऑनलाईन  आवेदन-पत्र  भरने  से  पूर्व  सर्वप्रथम  अभ्यर्थी  विस्तृत  विज्ञापन  का अध्ययन आवश्यक रूप  से  कर  लेंवे।  तदुपरान्त  ही  अभ्यर्थी  ऑनलाईन आवेदन करें।ऑनलाईन आवेदन करने की प्रक्रिया निम्नानुसार होगीः-

Step -1 - कंप्यूटर/लैपटॉप/ मोबाइल में किसी भी ब्राउजर (Browser) में SSO Portal https://sso.rajasthan.gov.in/signin?encq=6JkTF7D/fPuyiLpqlTuv+tsssIL22cKEce/qYZMZKsM= ओपन करके स्वयं की SSO ID & Password के द्वारा login करे


 

Step -2 - login करने के बाद Citizen Apps में उपलब्ध Recruitment Portal का चयन करना होगा

Step - 3 Recruitment Portal पर Form Apply करने के लिए One Time Registration अनिवार्य होगा, यदि आपने पहले One Time Registration कर रखा है तो सीधे Form के लिए Apply कर सकते हैं

Step - 4 Ongoing Recruitment Section में  Mahatma Gandhi Seva Prerak - 2023 पर Apply Now पर क्लिक करे

 

Step - 5 Enter Basic Details - Like as Name, Address, Contact  Number, Category, Email and Applying for Panchayat Samiti /Nagariyai Nikayai

Step - 6 Enter Personal Details - Like as Domicile Details, Click on Any one Experience Details

Step - 7 Enter Qualification Details - Like as 10th & 12th class

Step - 8 Identification Details - Upload Photo & Signature, Enter Body Mark

Step - 9 Please verify your filled details and Click on Check box @ Declaration Section click on submit button. 

 Step - 10 Download Filled Application Form & Take Print.

नोट -  महात्मा गाँधी सेवा प्रेरक भर्ती 2023 से संबंधित समस्त सूचना हेतु राजस्थान सरकार के शान्ति एवं अहिंसा विभाग की निम्नलिखित अधिकारिक वेबसाइट का नियमित अवलोकन करते रहे |

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