राजस्थान का एकीकरण
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राजस्थान में 19 राज्य (अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, कोटा, बूँदी, झालावाड़, टोंक, किशनगढ़, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, शाहपुरा, प्रतापगढ़, मेवाड़, जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही) और 3 छोटे ठिकाने (नीमराना, लावा, कुशलगढ़) थे। अजमेर मेरवाड़ा केंद्रशासित प्रदेश था।
इन राज्यों और ठिकानों को मिलाकर राजस्थान का एकीकरण 18 मार्च, 1948 से 1 नवम्बर, 1956 तक सात चरणों में हुआ।
मेवाड़ के महाराणा भूपालसिंह ने 25-26 जून, 1946 को उदयपुर में राजस्थान यूनियन बनाने के लिए एक सम्मेलन बुलाया, जिसमें 22 राजाओं ने भाग लिया।
उन्होंने के.एम. मुंशी को अपना संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया, लेकिन आपसी अविश्वास के कारण 'राजस्थान यूनियन' का प्रयास सफल नहीं हुआ।
5 जुलाई, 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में रियासती सचिवालय का गठन किया गया।
वी.पी. मेनन को रियासती सचिवालय का सचिव बनाया गया।
स्वतंत्र भारत में केवल वे राज्य ही अपना अलग अस्तित्व रख सकते थे जिनकी:-
जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो।
वार्षिक आय एक करोड़ रुपये से अधिक हो।
इस मापदंड के अनुसार राजस्थान में केवल चार राज्य - जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर और मेवाड़ ही अलग अस्तित्व बनाए रखने के योग्य माने गए। इस घोषणा के बाद राजस्थान के छोटे-छोटे राज्यों में अपने अस्तित्व को लेकर खलबली मच गई।
जयपुर के महाराजा मानसिंह ने भी संघ बनाने का प्रयास किया लेकिन वह भी सफल नहीं हो सका।
कोटा महाराव भीमसिंह ने 'हाड़ौती संघ' बनाने की कोशिश की, जो पारस्परिक अविश्वास के कारण सफल नहीं हुई।
डूंगरपुर महारावल लक्ष्मणसिंह ने 'बागड़ संघ' का प्रयास किया, जो भी असफल रहा।
जनता और जन-संगठनों ने वृहद् राजस्थान के निर्माण के लिए प्रयास किए और राजस्थान को भारतीय संघ में सम्मिलित करने की माँग की।
5 जुलाई, 1947 को सरदार पटेल ने देशी राजाओं से भारतीय संघ में शामिल होने का आह्वान किया। अधिकांश राजाओं ने पटेल की पहल पर अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसमें बीकानेर के शार्दुलसिंह पहले थे (7 अगस्त, 1947)। जोधपुर और धौलपुर ने बाद में क्रमशः 9 अगस्त और 14 अगस्त को अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए।
राजस्थान के एकीकरण के चरण
राजस्थान के एकीकरण के चरण निम्नानुसार थे -
प्रथम चरण - अलवर, भरतपुर, धौलपुर एवं करौली - मत्स्य संघ।
द्वितीय चरण - झालावाड, बूंदी, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, कोटा, प्रतापगढ़, किशनगढ़, टोंक, शाहपुरा व कुशलगढ़ - राजस्थान संघ।
तृतीय चरण - राजस्थान संघ व उदयपुर - संयुक्त राजस्थान।
चतुर्थ चरण - संयुक्त राजस्थान एवं जयपुर, जोधपुर, बीकानेर व जैसलमेर - वृहतर राजस्थान।
पंचम चरण - वृहतर राजस्थान एवं मत्स्य संघ - संयुक्त वृहद राजस्थान।
षष्टम चरण - संयुक्त वृहद राजस्थान एवं सिरोही - राजस्थान।
सप्तम चरण - षष्टम चरण में अजमेर तथा आबू, देलवाड़ा तहसील, मंदसौर जिले की मानपुरा तहसील के सुनेल टप्पा गाँव का विलय कर वर्तमान राजस्थान का निर्माण किया गया और कोटा जिले का सिरोंज का विलय मध्यप्रदेश में किया गया।
प्रथम चरण: मत्स्य संघ (17 मार्च, 1948) -
रियासती विभाग ने भौगोलिक, जातीय, और आर्थिक समानता के आधार पर धौलपुर, करौली, भरतपुर, और अलवर राज्यों को मिलाकर एक संघ बनाने का विचार प्रस्तुत किया।
27 फरवरी, 1948 को दिल्ली में चारों राज्यों के शासकों को बुलाकर संघ निर्माण का प्रस्ताव दिया गया, जिसे सभी ने स्वीकार किया और 28 फरवरी, 1948 को दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।
अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली रियासतों को मिलाकर मत्स्य संघ का निर्माण किया गया।
मत्स्य संघ का निर्माण 17 मार्च, 1948 को किया गया।
नामकरण - के.एम. मुंशी द्वारा, क्योंकि महाभारत काल में यह क्षेत्र 'मत्स्य प्रदेश' के नाम से जाना जाता था।
उद्घाटन कर्ता - एन.वी. गाडगिल द्वारा भरतपुर दुर्ग में।
राजप्रमुख - धौलपुर शासक उदयभान सिंह।
उपराजप्रमुख - करौली महाराजा को।
प्रधानमंत्री - शोभाराम कुमावत।
राजधानी - अलवर।
शोभाराम कुमावत के नेतृत्व में निम्नलिखित को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया -
जुगल किशोर चतुर्वेदी (भरतपुर)
मास्टर भोलानाथ (अलवर)
गोपीलाल यादव, डॉ. मंगल सिंह (धौलपुर)
चिरंजीलाल शर्मा (करौली)
मत्स्य संघ का क्षेत्रफल 12000 वर्ग किमी., जनसंख्या लगभग 18 लाख और वार्षिक आय 2 करोड़ से कम थी।
द्वितीय चरण : राजस्थान संघ (25 मार्च, 1948)
3 मार्च, 1948 को कोटा, डूंगरपुर और झालावाड़ के शासकों ने रियासती विभाग के समक्ष एक संघ बनाने का प्रस्ताव रखा।
प्रस्ताव में कोटा, बूँदी, झालावाड़, टोंक, किशनगढ़, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, शाहपुरा, प्रतापगढ़ राज्यों एवं लावा व कुशलगढ़ ठिकानों को सम्मिलित करने की बात कही गई।
रियासती विभाग का विचार था कि इन राज्यों को मध्य भारत के अन्य राज्यों के साथ मिलाया जाए, लेकिन राज्यों के प्रजामण्डल और शासकों ने राजस्थान के अन्य राज्यों के साथ एकीकरण का समर्थन किया।
मेवाड़ के शासक ने संघ में सम्मिलित होने से इंकार कर दिया, लेकिन उसने सभी राज्यों के मेवाड़ में विलय का प्रस्ताव दिया।
मेवाड़ की असहमति के बावजूद, भारत सरकार ने दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के राज्यों (कोटा, बूँदी, झालावाड़, टोंक, किशनगढ़, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, शाहपुरा, प्रतापगढ़) को मिलाकर राजस्थान संघ बनाने का निर्णय लिया।
संघ का क्षेत्रफल 16807 वर्ग किमी, जनसंख्या लगभग 23.5 लाख और वार्षिक आय 2 करोड़ रु. से अधिक थी।
संघ का उद्घाटन 25 मार्च, 1948 को कोटा में किया गया, जिसमें केन्द्रीय मंत्री नरहरि विष्णु गाडगिल ने शपथ दिलाई।
कोटा के महाराव भीमसिंह को संघ का राजप्रमुख बनाया गया।
बूँदी के शासक बहादुरसिंह को वरिष्ठ उपराजप्रमुख और डूंगरपुर के महारावल लक्ष्मणसिंह को कनिष्ठ उपराजप्रमुख का पद दिया गया।
शाहपुरा प्रजामण्डल के नेता गोकुललाल असावा को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, लेकिन मंत्रिमण्डल गठन का कार्य स्थगित रखा गया।
तृतीय चरण : संयुक्त राजस्थान (18 अप्रैल, 1948) - राजस्थान संघ में मेवाड़ का विलय
- 28 मार्च, 1948 को मेवाड़ के महाराणा भूपालसिंह ने औपचारिक रूप से मेवाड़ को राजस्थान संघ में विलय करने की स्वीकृति दी।
- मेवाड़ दरबार और भारत सरकार के बीच विलय की शर्तों पर वार्ता हुई, जिसमें मेवाड़ की तीन प्रमुख माँगें रखी गईं:
- महाराणा भूपालसिंह को संयुक्त राजस्थान का वंशानुगत राजप्रमुख बनाया जाए।
- महाराणा को 20 लाख रु. वार्षिक प्रिवीपर्स दिया जाए।
- उदयपुर को संयुक्त राजस्थान की राजधानी बनाया जाए।
- भारत सरकार द्वारा शर्तों की स्वीकृति: रियासती विभाग ने महाराणा भूपालसिंह को केवल आजीवन राजप्रमुख बनाए जाने की स्वीकृति दी। प्रिवीपर्स की राशि 10 लाख रु. वार्षिक रखी गई, साथ ही 5 लाख रु. राजप्रमुख के भत्ते के रूप में और 5 लाख रु. धार्मिक कार्यों के लिए मंजूर किए गए।
- संघ का नाम और राजधानी:
- नए संघ का नाम 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ राजस्थान' (संयुक्त राजस्थान) रखा गया।
- उदयपुर को संघ की राजधानी बनाया गया, लेकिन यह भी तय किया गया कि विधानसभा का एक अधिवेशन प्रतिवर्ष कोटा में होगा।
- संघ का उद्घाटन और पदाधिकारियों का चयन:
- 18 अप्रैल, 1948 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उदयपुर से 'संयुक्त राजस्थान' का उद्घाटन किया।
- महाराणा भूपालसिंह को आजीवन राजप्रमुख, कोटा के महाराव भीमसिंह को वरिष्ठ उपराजप्रमुख, और बूँदी के महाराव बहादुरसिंह तथा डूंगरपुर के महारावल लक्ष्मणसिंह को कनिष्ठ उपराजप्रमुख नियुक्त किया गया।
- माणिक्यलाल वर्मा को संयुक्त राजस्थान का मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया।
- मंत्रिमण्डल का गठन:
- प्रजामण्डल के प्रतिनिधियों को मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया, जिनमें गोकुललाल असावा (शाहपुरा), प्रेमनारायण माथुर, भूरेलाल बयाँ, मोहनलाल सुखाड़िया (उदयपुर), भोगीलाल पंड्या (डूंगरपुर), अभिन्न हरि (कोटा), और बृजसुन्दर शर्मा (बूँदी) शामिल थे।
- यह मंत्रिमण्डल 11 माह तक कार्यरत रहा।
- संयुक्त राजस्थान की स्थिति:
- संयुक्त राजस्थान का कुल क्षेत्रफल 29777 वर्ग मील, जनसंख्या 42,60,918 और वार्षिक आय 316 लाख रु. थी।
चतुर्थ चरण : वृहद् राजस्थान का गठन (30 मार्च, 1949)
- 'मत्स्य संघ' और 'संयुक्त राजस्थान' के गठन के बाद भी कुछ राज्य (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और सिरोही) एकीकरण की प्रक्रिया से बाहर थे।
- जनता और जनप्रतिनिधि इन राज्यों को एकत्र कर एक मजबूत और सुसंगठित राज्य, वृहद् राजस्थान, का निर्माण चाहते थे।
- समाजवादी दल ने राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में 'राजस्थान आन्दोलन समिति' का गठन कर सभी राज्यों के एकीकरण की मांग उठाई।
- भारत सरकार की पहल:
- भारत सरकार भी इन राज्यों का एकीकरण चाहती थी। दिसम्बर 1948 में रियासती विभाग के सचिव वी.पी. मेनन ने जयपुर, जोधपुर, और बीकानेर के शासकों से वार्ता शुरू की।
- 11 जनवरी 1949 को जयपुर महाराजा ने वृहद् राजस्थान में जयपुर के विलय के लिए सहमति दी। बीकानेर और जोधपुर के शासकों ने भी बाद में अपनी स्वीकृति दी।
- 14 जनवरी 1949 को सरदार पटेल ने उदयपुर में घोषणा की कि जयपुर, जोधपुर और बीकानेर के शासकों ने वृहद् राजस्थान में अपने राज्यों के विलय को सिद्धांत रूप से स्वीकार कर लिया है।
- महत्त्वपूर्ण बैठक और पदों का निर्धारण:
- 3 फरवरी 1949 को सरदार पटेल ने दिल्ली में एक बैठक बुलाई, जिसमें गोकुलभाई भट्ट, जयनारायण व्यास, और हीरालाल शास्त्री उपस्थित थे।
- बैठक में निर्णय लिया गया कि जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह को वृहद् राजस्थान का आजीवन राजप्रमुख नियुक्त किया जाएगा।
- अन्य प्रमुख पदों में मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह को महाराज प्रमुख, जोधपुर महाराजा हनुवंतसिंह और कोटा महाराव भीमसिंह को वरिष्ठ उपराजप्रमुख तथा बूंदी महाराव बहादुरसिंह और डूंगरपुर महारावल लक्ष्मणसिंह को कनिष्ठ उपराजप्रमुख बनाया गया।
- राज्य के प्रिवीपर्स और अन्य लाभ:
- जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, और जैसलमेर के शासकों को क्रमशः 18 लाख, 17 लाख 50 हजार, 17 लाख और 2 लाख 80 हजार रुपये वार्षिक प्रिवीपर्स देने का निर्णय हुआ।
- जयपुर महाराजा को राजप्रमुख के रूप में अतिरिक्त साढ़े पाँच लाख रुपये भत्ते के रूप में प्रदान किए गए।
- वृहद् राजस्थान की राजधानी और प्रशासनिक विभाग:
- वृहद् राजस्थान की राजधानी के संबंध में मतभेद थे, जिसके समाधान के लिए पी. सत्यनारायण राव समिति गठित की गई, इस समिति में पी. सत्यनारायण राव के अतिरिक्त वी. विश्वनाथ एवं वी. गुप्ता थे।।
- उक्त समिति की सिफारिशे निम्नानुसार थी -
- जयपुर राजधानी बनी रहे।
- राजस्व मंडल एवं राजस्थान लोक सेवा आयोग अजमेर में हो।
- हाईकोर्ट जोधपुर में हो।
- खनिज विभाग उदयपुर में हो।
- कृषि विभाग भरतपुर में हो।
- शिक्षा विभाग बीकानेर में हो।
- वन एवं सहकारी विभाग कोटा में हो।
- मुख्यमंत्री की नियुक्ति:
- सरदार पटेल की इच्छा अनुसार, हीरालाल शास्त्री को वृहद् राजस्थान का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया।
- वृहद् राजस्थान का उद्घाटन:
- 30 मार्च 1949 को सरदार पटेल ने जयपुर में वृहद् राजस्थान का उद्घाटन किया, जो अब राजस्थान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- 4 अप्रैल 1949 को हीरालाल शास्त्री ने मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला और 7 अप्रैल को अपना मंत्रिमंडल गठित किया, जिसमें सिद्धराज ढड्ढ़ा, प्रेमनारायण माथुर, भूरेलाल बयां, फूलचंद बाफना, नरसिंह कच्छावा, रावराजा हनुवंतसिंह, रघुवरदयाल गोयल और वेदपाल त्यागी को शामिल किया गया।
30 मार्च को राजस्थान के अधिकांश रियासतों के एकीकरण की पूर्णता के उपलक्ष्य में 'राजस्थान दिवस' के रूप में मनाया जाता है, जो राज्य के एकीकरण और एकता का प्रतीक है।
पंचम चरण : संयुक्त वृहद् राजस्थान का गठन (15 मई, 1949)
मत्स्य संघ के निर्माण के समय ही इसके चारों राज्यों (अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली) को यह बता दिया गया था कि भविष्य में इस संघ का उत्तरप्रदेश या राजस्थान में विलय किया जा सकता है।
13 फरवरी, 1949 को मत्स्य संघ के शासकों और मंत्रियों को दिल्ली बुलाया गया। यहाँ उत्तरप्रदेश या राजस्थान में विलय के विकल्पों पर विचार किया गया।
अलवर और करौली के शासकों ने राजस्थान में विलय के लिए सहमति दी, लेकिन भरतपुर और धौलपुर के शासक इसके लिए तैयार नहीं थे।
23 मार्च, 1949 को वी.पी. मेनन के साथ भरतपुर और धौलपुर के शासकों की पुनः वार्ता हुई।
भरतपुर के शासक ने जनता की राय के अनुसार राजस्थान में विलय की स्वीकृति दी, जबकि धौलपुर के शासक ने भी जनता की इच्छानुसार निर्णय लेने की बात रखी।
भरतपुर और धौलपुर की जनता की राय जानने के लिए शंकरराव देव की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि जनता राजस्थान में विलय के पक्ष में है।
अंतिम स्वीकृति और विलय पत्र पर हस्ताक्षर:
10 मई, 1949 को मत्स्य संघ के चारों राज्यों के शासकों ने दिल्ली में वृहद् राजस्थान में विलय के लिए अपनी स्वीकृति दे दी।
- चारों राज्यों के शासकों और वृहद् राजस्थान के राजप्रमुख ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
संयुक्त वृहद् राजस्थान का निर्माण:
15 मई, 1949 को मत्स्य संघ का प्रशासन वृहद् राजस्थान को हस्तांतरित कर दिया गया।
- मत्स्य संघ के मुख्यमंत्री शोभाराम को हीरालाल शास्त्री के मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया।
- इस प्रकार, वृहद् राजस्थान में मत्स्य संघ के विलय से 'संयुक्त वृहद् राजस्थान' का गठन हुआ।
षष्ठम चरण : सिरोही का राजस्थान में विलय (26 जनवरी, 1950)
'संयुक्त वृहद् राजस्थान' के निर्माण के बाद भी सिरोही राज्य राजस्थान से अलग था।
सरदार पटेल और गुजरात के नेता सिरोही और आबू क्षेत्र को गुजरात में मिलाने के पक्षधर थे, उनका तर्क था कि आबू पर्वत पर स्थित जैन मंदिरों में गुजरात से आने वाले तीर्थयात्री बड़ी संख्या में दर्शन हेतु आते हैं।
गुजरात के नेताओं का यह भी तर्क था कि सिरोही का राजपरिवार भी कच्छ और काठियावाड़ के राजपरिवार से संबंधित रहा है।
1 फरवरी, 1948 को रियासती विभाग ने सिरोही को राजपूताना एजेंसी से हटाकर गुजरात एजेंसी के अधीन कर दिया।
राजस्थान के नेताओं का विरोध:
राजस्थान के नेताओं ने सिरोही को गुजरात में सम्मिलित करने का कड़ा विरोध किया।
- उनका तर्क था कि सिरोही राज्य सदियों से राजपूताना का हिस्सा रहा है और इसकी संस्कृति एवं भाषा राजस्थान से मेल खाती है।
- सिरोही में गुजराती बोलने वालों की संख्या भी बहुत कम थी और आबू पर्वत राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन था, जो राजस्थान के शासकों का ग्रीष्मकालीन प्रवास स्थल भी रहा है।
हीरालाल शास्त्री एवं अन्य नेताओं की पहल:
10 अप्रैल, 1948 को हीरालाल शास्त्री ने सरदार पटेल को पत्र लिखकर सिरोही के राजस्थान में विलय की माँग की।
- 18 अप्रैल, 1948 को उदयपुर में संयुक्त राजस्थान के उद्घाटन के अवसर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पंडित नेहरू से सिरोही के राजस्थान में विलय की अपील की, जिसके बाद नेहरू ने सरदार पटेल को जनता की भावनाओं का सम्मान करने का सुझाव दिया।
भारत सरकार द्वारा सिरोही का प्रशासन अपने हाथ में लेना:
8 नवम्बर, 1948 को सरदार पटेल ने सिरोही रीजेंसी कौंसिल से समझौता करके सिरोही का प्रशासन भारत सरकार को सौंप दिया।
- 5 जनवरी, 1949 को भारत सरकार ने सिरोही का प्रशासन बंबई सरकार को सौंप दिया।
विलय का अंतिम निर्णय:
राजस्थान में सिरोही को मिलाने के लिए आंदोलन जारी था।
- 26 जनवरी, 1950 को सरदार पटेल ने सिरोही राज्य को दो भागों में विभाजित कर दिया:
- आबू और देलवाड़ा को बंबई राज्य में मिला दिया गया।
- शेष सिरोही राज्य को राजस्थान में सम्मिलित कर दिया गया।
विरोध और आंदोलन:
सिरोही और राजस्थान में इस विभाजन के विरुद्ध व्यापक आंदोलन हुआ, जिसमें गोकुलभाई भट्ट और बलवंत सिंह मेहता जैसे नेताओं ने भाग लिया।
- भारत सरकार द्वारा निर्णय पर पुनर्विचार का आश्वासन दिए जाने पर आंदोलन शांत हुआ।
सप्तम चरण : वर्तमान राजस्थान (1 नवम्बर, 1956)
अजमेर का केन्द्रीय शासित क्षेत्र होना:
स्वतंत्रता के बाद भी अजमेर क्षेत्र केन्द्र शासित राज्य के रूप में रहा।
- राजस्थान के अन्य राज्यों के विलय के बाद अजमेर को राजस्थान में मिलाने की माँग उठी, परंतु स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व इसे राजस्थान से अलग रखना चाहता था।
- 1952 में हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृत्व में बने कांग्रेस मंत्रिमंडल ने अजमेर को राजस्थान से अलग रखने का प्रयास किया।
राजस्थान के नेताओं का समर्थन:
वी.पी. मेनन और राजस्थान के जननेताओं ने अजमेर के राजस्थान में विलय का समर्थन किया।
- अजमेर राजस्थान के बीच स्थित था और छोटा राज्य होने के कारण शासकीय रूप से कमजोर हो गया था। भाषा, रहन-सहन, और संस्कृति के लिहाज से अजमेर का राजस्थान से गहरा संबंध था, और इसके लोगों की परंपरागत आस्थाएँ राजस्थान से जुड़ी थीं।
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशें:
1953 में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग, जिसमें न्यायमूर्ति फजल अली अध्यक्ष थे, ने अजमेर के राजस्थान में विलय की सिफारिश की।
1 नवम्बर, 1956 को अंतिम विलय:
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश के अनुसार, 1 नवम्बर, 1956 को अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र का राजस्थान में विलय हुआ।
- साथ ही माउंट आबू और देलवाड़ा तहसील का भी राजस्थान में विलय हुआ।
- मंदसौर जिले की मानपुरा तहसील के सुनेल टप्पा गाँव का भी राजस्थान में विलय कर दिया गया।
- कोटा जिले का सिरोज उपविभाग मध्य प्रदेश में मिलाया गया।
राजस्थान का पूर्ण राज्य बनना:
भारत के संविधान के अनुसार, राजस्थान द्वितीय श्रेणी (पार्ट बी) के राज्यों में शामिल था, जो स्वतंत्रता के बाद छोटे-बड़े राज्यों के एकीकरण से बने थे।
- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में तीन श्रेणी के राज्य थे।
- ‘ए’ श्रेणी - वे राज्य, जो पूर्व में प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण में थे, इनके प्रमुख को राज्यपाल (गवर्नर) कहलाते थे।
- ‘ब’ श्रेणी - वे राज्य, जो स्वतंत्रता के बाद छोटी बड़ी रियासतों के एकीकरण द्वारा बनाये गये थे, इनके प्रमुख को राजप्रमुख कहलाते थे। जैसे - राजस्थान, मध्यभारत आदि।
- ‘सी’ श्रेणी - वे राज्य, जिन्हें ब्रिटिश काल में चीफ कमिश्नर के प्रान्त कहा जाता था।
- 7 वां संविधान संशोधन विधेयक 1956 के तहत राज्यों की तीन श्रेणी को समाप्त कर राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश बना दिए गये हैं।
- राज्य पुनर्गठन आयोग (फजल अली) की सिफारिशों के अनुसार -
- 1 नवम्बर, 1956 से राजप्रमुख के स्थान पर राज्यपाल पद सृजित किया गया।
- राजस्थान के प्रथम राज्यपाल गुरुमुख निहाल सिंह बने।
- इस विलय के साथ राजस्थान एक संगठित और पूर्ण राज्य बन गया।
- राज्य के प्रशासनिक और सांस्कृतिक एकता को मजबूती मिली, जिससे राजस्थान का भौगोलिक और प्रशासनिक स्वरूप संपूर्ण हुआ।
No comments:
Post a Comment