राजस्थान का प्रागैतिहासिक काल
यह काल मानव की प्रारंभिक जानकारी का उजागर करता है। यह जानकारी उन पाषाण (पत्थर) निर्मित उपकरणों सहायता से प्राप्त होती है। ये उपकरण लगभग 1.5 लाख वर्ष पुराने है। पाषाण युग के साक्ष्य राजस्थान में बनास, बेड़च, गंभीर चम्बल आदि नदियों की घाटियों व समीपस्थ स्थानों से प्राप्त हुए हैं।
प्रागैतिहासिक काल को मोटे रूप में तीन भागों में बांटा गया है -
पुरापाषाण काल (2,40,000 ई.पू. - 1,00,000 ई.पू.)
मध्यपाषाण काल (1,00,000 ई.पू.- 9,000 ई.पू.)
नवपाषाण काल (9000 ई.पू. - 3,000 ई.पू.)
पुरापाषाण काल
राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य सर्वप्रथम 1871 ई. में प्रारम्भ करने का श्रेय ए.सी. एल. कार्लाइल को जाता है।
उपकरण - हाथकुठार, गंडासे, शल्कल।
राजस्थान में पुरा पाषाणकाल के उपकरण निम्नलिखित क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं -
1. भैंसरोड़गढ़ व नवाघाट (बामनी नदी के तट पर) चित्तौड़गढ़।
2. हम्मीरगंज, जहाजपुर, बीगोद (बनास नदी के तट पर) भीलवाड़ा।
3. खोर, ब्यावर, बल्लूखेड़ा, नगरी (बेड्च एवं गंभीरी नदी के तट पर)।
4. लूनी नदी की घाटी (जोधपुर)।
5. सिंगारी व पाली (गुहिया एवं बाण्डी के तट पर)।
इस काल में मनुष्य बर्बर था। मानव व जंगली जीवों के रहन-सहन में ज्यादा अंतर नहीं था। विराटनगर (जयपुर) से शैलाश्रय (गुफा) प्राप्त हुई है। लेकिन इन गुफाओं में चित्र नहीं मिले हैं।
दर (भरतपुर) से कुछ चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं जिनमें मानव, बाघ, सूर्य तथा बारहसिंगा की आकृति अंकित हैं।
मध्यपाषाण काल
उपकरण - स्क्रेपर एवं पाइंट।
उपकरण हल्के एवं छोटे थे।
राजस्थान में मध्यपाषाणकालीन उपकरण निम्नलिखित क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं -
1. बागोर (भीलवाड़ा)
2. लूनी नदी घाटी (जोधपुर)
3. बेडच नदी घाटी (चित्तौड़गढ़)
मध्यपाषाण काल में मानव ने पशुपालन की शुरूआत की लेकिन वह अभी भी खानाबदोश जीवन व्यतीत करता था। वह कृषि कार्य से अभी भी अवगत नहीं था।
मध्यपाषाण काल में राजस्थान के बागौर (भीलवाड़ा), तिलवाड़ा (बाड़मेर) तथा आदमगढ़ (मध्यप्रदेश) से 5000 ई. पू. के आस - पास पशुपालन के प्राचीनतम अवशेष प्राप्त हुए हैं। राजस्थान में इस काल के अवशेष आलणियाँ, विलासगढ़, दर्रा (कोटा), विराटनगर (जयपुर), सोहनपुरा (सीकर), हरसोरा व सामधा (अलवर) से प्राप्त हुए हैं।
नवपाषाण काल
इस काल में मनुष्य स्थायी जीवन व्यतीत करने लगा था।
वह पशुपालन के साथ कृषि कार्य में भी संलग्न था। फलस्वरूप मानव अब स्थायी बस्ती में रहने लगा था।
इस काल में मानव मृदभाण्डों एवं हथियारों पर पॉलिश करने लगा था।
इस काल में मृतकों को यत्र-तत्र ना फेंककर जमीन में गाढ़ा (शवाधान) जाता था।
राजस्थान में नवपाषाणिक क्षेत्र निम्नानुसार है -
1. बागोर (भीलवाड़ा)
2. तिलवाड़ा (बाड़मेर)
3. भैंसरोड़गढ़ व नवाघाट (चित्तौड़गढ़)
4. देवली, गिलूण्ड, जहाजपुर, हम्मीरगढ़
5. भरनी (टोंक)
राज्य के शैलचित्र स्थल निम्नानुसार है -
1. छाजा नदी (बूंदी)
2. हरसौरा (अलवर)
3. आलनिया (कोटा)
4. विराटनगर (जयपुर)
5. सोहनपुरा (सीकर)
राजस्थान में सिंधु सभ्यता के प्रमुख स्थल
राजस्थान में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रतिनिधि स्थलों में कालीबंगा, रंगमहल, पीलीबंगा (हनुमानगढ़), तरखानवाला डेरा (श्रीगंगानगर) आदि स्थल प्रमुख हैं।
कालीबंगा
प्राचीन दृषद्वती और सरस्वती नदी घाटी (वर्तमान में घग्घर नदी का क्षेत्र) क्षेत्र में सैन्धव सभ्यता से भी प्राचीन कालीबंगा की सभ्यता पल्लवित और पुष्पित हुई।
वर्तमान में हनुमानगढ़ जिले में स्थित यह सभ्यता 4000 ईसा पूर्व से भी अधिक प्राचीन मानी जाती है।
सर्वप्रथम 1952 ई. में अमलानन्द घोष ने इसकी खोज की और तत्पश्चात् 1961 से 1964 ई. के मध्य श्री बी.बी. लाल, श्री बी. के. थापर एवं श्री एम.डी. खरे द्वारा यहाँ उत्खनन कार्य करवाया गया।
यहाँ उत्खनन पाँच स्तरों तक किया गया, जिसमें प्रथम एवं द्वितीय स्तर सिंधु सभ्यता से प्राचीन एवं तीसरा, चौथा एवं पाँचवाँ स्तर सिंधु सभ्यता के समकालीन माना जाता है।
कालीबंगा सभ्यता की विशेषता निम्नानुसार है -
इसका शाब्दिक अर्थ "काले रंग की चूडियाँ" है।
यहाँ पश्चिम में दुर्ग टीला तथा पूर्व में नगर टीला स्थित है। ये दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से सुरक्षित किए गए थे, दुर्ग टीले के नीचे प्राक् हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मिलते हैं।
कालीबंगा सुव्यवस्थित नगर योजना के अनुसार बसा हुआ था।
पाँच से साढ़े पाँच मीटर तक चौड़ी एवं समकोण पर काटती सड़कें, सड़कों के किनारे नालियाँ आदि इसके विकास की परिचायक थी।
यहाँ से प्राप्त एक मुद्रा पर व्याघ्र का अंकन है।
मकान बनाने में मिट्टी की ईंटों को धूप में पकाकर प्रयुक्त किया जाता था (ईंट पकाने के भट्ट के अवशेष नहीं मिले हैं) जिन पर गारे का पलस्तर किया जाता था।
लेकिन नालियों एवं कुओं में पक्की ईंटों के अवशेष मिलते हैं।
कमरों के फर्श को चिकनी मिट्टी से लीपा जाता था।
मकानों की छत बनाने के लिए कवेलू का प्रयोग नहीं मिलता है, बल्कि लकड़ी की बल्लियों पर मिट्टी का लेप करके छत तैयार की जाती थी।
उत्खनन से प्राप्त मिट्टी के बर्तन एवं उनके अवशेष पतले और हल्के हैं तथा उनमें सुंदरता व सुडौलता का भी अभाव है। बर्तनों का रंग लाल है, जिन पर काली एवं सफेद रंग की रेखाएँ खींची गई हैं। बर्तनों पर फूल-पत्तियों के अलंकरण के साथ- साथ मछली, कछुए, बतख एवं हिरन की आकृतियाँ भी चित्रित की जाती थीं।
पशु- पक्षियों के स्वरूप वाले खिलौने, मिट्टी की मुहरें, चूड़ियाँ, काँच के मनके, ताँबे की चूड़ियाँ, औजार एवं तौल के बाट भी उत्खनन में मिले हैं।
यहाँ से प्राप्त एक बालक को खोपड़ी में छः छेद है, जिनके निरीक्षण से स्पष्ट है कि बालक की खोपड़ी की शल्य चिकित्सा की गई थी।
यहाँ के निवासी मृतक के शव को गाड़ते थे, जिसका प्रमाण वहाँ मिली कब्रगाह है। मृतक के पास बर्तन एवं गहने आदि रखे जाने के प्रमाण मिले हैं।
ईंट के चबूतरे पर सात हवन कुण्ड के साक्ष्य प्राप्त हुऐ है। जिनमें जानवरों की अस्थियाँ प्राप्त हुई है।
कालीबंगा की लिपि सिंधु लिपि के समान ही थी जिसे दायें से बायें लिखा जाता था।
मिट्टी के भाण्डों एवं मुहरों पर लिपि के अवशेष मिलते हैं। लेकिन इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
कालीबंगा से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिलते हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि लोग एक ही खेत में दो फसलें उगाते थे।
यहाँ से भूकंप आने के प्राचीनतम साक्ष्य भी मिलते हैं, जिससे यहाँ की प्राकसिंधु सभ्यता का अंत हुआ।
रंगमहल सभ्यता
हनुमानगढ़ जिले में स्थित रंगमहल सभ्यता प्राचीन सरस्वती एवं दृषद्वती नदी घाटी में पल्लवित-पुष्पित हुई।
उत्खनन - 1952-54 ई. में स्वीडन की पुरातत्वविद् श्रीमती हन्नारिड़ के निर्देशन में हुआ।
रंगमहल से प्राप्त मृद्घात्र गहरे लाल, गुलाबी तथा कहीं-कहीं पीलापन लिए हुए हैं।
लाल रंग के पात्रों पर काले रंग के डिजाइन के कारण ही इसे रंगमहल नाम मिला।
यहाँ से घंटाकार मृद्घात्र, टोंटीदार घड़े, छोटे-बड़े प्याले, कटोरे, बर्तनों के ढक्कन, दीपदान, धूपदान आदि मिले हैं। पात्रों पर मानव तथा पशु आकृतियाँ चित्रित हैं। बच्चों के खेलने की मिट्टी की छोटी पहिएदार गाड़ियाँ भी मिली हैं।
यहाँ से कुषाण शासकों के सिक्के एवं मिट्टी की मुहरें भी मिली हैं। इसे कुषाणकालीन सभ्यता के समान माना जाता है।
बरोर की सभ्यता
गंगानगर जिले का बरोर गाँव सरस्वती नदी तट पर अवस्थित है।
यहाँ 2003 ई. में उत्खनन कार्य शुरू हुआ।
उत्खनन से प्राप्त अवशेषों के आधार पर यहाँ की सभ्यता को प्राक् एवं विकसित सैन्धव काल की माना जाता है।
यहाँ से प्राप्त मृद्भाण्डों में काली मिट्टी मिली है।
मई, 2006 में मिट्टी के एक पात्र में सेलखड़ी के लगभग 8000 मनके मिले हैं, उनके साथ शंख की तराशी चूड़ियाँ, अँगूठी, बोरला तथा लाजवर्द मनके मिले हैं। लाजवर्द मनके केवल अफगानिस्तान में मिलते हैं।
यहाँ से शहरी सभ्यता के पुरावशेष, सुनियोजित नगर विन्यास, भवन निर्माण में कच्ची ईंटों का प्रयोग, उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था और विशिष्ट मृद्भाण्ड परंपरा विकसित सैन्धव सभ्यता के समान है।
यहाँ से बटन के आकार की मुहरें भी उपलब्ध होती हैं।
सोथी सभ्यता
स्थान - हनुमानगढ़।
इस स्थल की खोज टैस्सीटोरी द्वारा की गई।
यहाँ पर साक्ष्य हड़प्पाकालीन (प्राक् हड़प्पाकालीन) प्राप्त हुये है।
ताम्रपाषाणीक स्थल
आहड़
उदयपुर शहर के पास बहने वाली आहड़ नदी (बेड़च) के तट पर बसे आहड़ कस्बे से उत्खनन में चार हजार वर्ष पुरानी प्रस्तर धातु युगीन सभ्यता के अवशेष प्रकाश में आए।
सर्वप्रथम 1953 ई. में यहाँ अक्षय कीर्ति व्यास एवं तत्पश्चात् 1956 ई. में रतन चन्द्र अग्रवाल एवं 1961-62 ई. में एच.डी. साँकलियाँ के निर्देशन में उत्खनन कार्य करवाया गया।
उत्खनन में यहाँ बस्तियों के आठ स्तर मिले हैं।
चौथे स्तर से ताँबे की दो कुल्हाड़ियाँ मिली हैं।
इस सभ्यता के लोग मकान बनाने में धूप में सुखाई गई ईंटों एवं पत्थरों का प्रयोग करते थे। मकानों की छतों पर बाँस बिछाकर उस पर मिट्टी का लेप किया जाता था। मकानों से गंदा पानी निकालने की नालियों के प्रमाण भी मिले हैं।
मकानों में एक से अधिक चूल्हे मिलना संयुक्त परिवार प्रणाली की विद्यमानता प्रकट करते हैं।
उत्खनन में मृद्भाण्ड सर्वाधिक मिले हैं, जो आहड़ को लाल-काले मृद्भाण्ड वाली संस्कृति का प्रमुख केन्द्र सिद्ध करते हैं।
आहड़ का दूसरा नाम ताम्रवती नगरी भी मिलता है जो यहाँ ताँबे के औजारों एवं उपकरणों के अत्यधिक प्रयोग का सूचक है।
दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में इसे आघाटपुर या आघाट दुर्ग के नाम से जाना जाने लगा। इसे 'धूलकोट' भी कहते है।
पशुपालन इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार था, इन्हें कुत्ता, हाथी, मेढ़ा, गैंडा आदि पशुओं का ज्ञान था। आहड़ निवासी कृषि (चावल) से भी परिचित थे। आहड़ वाले कृषि करते थे और शवों को गाड़ते थे।
यहाँ की खुदाई में अनाज रखने के बड़े मृदभांड़ भी गढ़े हुए मिले है जिन्हें यहाँ की आम बोलचाल की भाषा में 'गोरे' व 'कोठे' कहा जाता है।
यहाँ ताँबे की छह मुद्राएँ, ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, अगूठियाँ, चूड़ियाँ, ताँबे की कलाकृतियाँ व चद्दरें मिली हैं। इनमें से एक मुद्रा पर त्रिशूल व दूसरी पर यूनानी देवता अपोलो का चित्र मिलता है तथा यूनानी भाषा में लेख मिलता है। यह मुद्रा द्वितीय शताब्दी की है।
उत्खनन में मिट्टी एवं पत्थर के मनके व आभूषण तथा पशु-पक्षी आकृति युक्त मिट्टी के खिलौने भी प्राप्त हुए हैं।
उत्खनन से प्राप्त ठप्पों से यहाँ रंगाई-छपाई व्यवसाय के उन्नत होने का अनुमान भी लगाया जाता है।
तौल के बाट व माप मिलना यहाँ वाणिज्य-व्यापार की उन्नति का संकेत करता है।
खुदाई में पूजा पात्र भी प्राप्त हुए हैं।
ओझियाना की सभ्यता
ओझियाना भीलवाड़ा जिले में स्थित आहड़ संस्कृति से संबंधित पुरास्थल है।
यहाँ 2000 ई. में बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी के द्वारा उत्खनन किया गया।
यहाँ से प्राप्त मृद्घात्रों एवं भवन संरचना से अनुमान लगाया जाता है कि इस संस्कृति का विकास तीन चरणों में हुआ।
उत्खनन में सभी चरणों से लाल एवं काले रंग के मृद्घात्र जो सफेद रंग से चित्रित हैं, प्राप्त हुए हैं। किंतु प्रत्येक चरण में इन पात्रों को बनाने की विधि भिन्न-भिन्न रही है।
यहाँ से बैल एवं गाय की मृण्मूर्ति, कार्नेलियन फियांस तथा पत्थर के मनके, शंख एवं ताँबे की चूड़ियाँ, मृण्मय खिलौना गाड़ी के पहिये, सिलबट्टा, प्रस्तर हथौड़ा, गोल छेद वाला पत्थर आदि सामग्री प्राप्त हुई है, जिससे अनुमान किया जाता है कि यह स्थल 2000 ई.पू. के लगभग आबाद रहा होगा।
गणेश्वर की सभ्यता
गणेश्वर नीमकाथाना जिले की नीमकाथाना तहसील के अंतर्गत काँटली नदी के उद्गम पर ताम्रयुगीन संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थल है।
इस स्थल का उत्खनन रत्नचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में हुआ एवं यहाँ 2800 ईसा पूर्व की सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
गणेश्वर से प्रचुर मात्रा में ताम्र आयुध व उपकरण मिले हैं जो इसे ताम्रयुगीन सभ्यताओं में प्राचीनतम सिद्ध करते हैं।
यहाँ से प्राप्त ताम्र उपकरणों व पात्रों में 99 प्रतिशत ताँबा है, जो इस क्षेत्र में ताम्र की प्रचुर प्राप्ति का द्योतक है।
यहाँ से काले व नीले रंग से अंलकृत मृद्घात्र भी मिले हैं।
यहाँ मकानों के लिए पत्थर का प्रयोग करने के साक्ष्य मिलते हैं।
बस्ती को बाढ़ से बचाने के लिए पत्थर के बाँध भी बनाए गए थे।
गणेश्वर भारत की ताम्र सभ्यताओं की जननी माना जाता है। यहाँ से ताँबा हड़प्पा व मोहनजोदड़ो को भेजा जाता था।
गिलूण्ड सभ्यता
राजसमन्द जिले के अंतर्गत गिलूण्ड कस्बे में बनास नदी तट पर दो टीलों पर (जिसे स्थानीय लोग 'मोडिया मंगरी' कहते हैं) उत्खनन के फलस्वरूप आहड़ संस्कृति से जुड़ी सभ्यता उद्घाटित हुई, जिसे बनास संस्कृति के नाम से भी पुकारा जाता है।
1957-58 ई. में श्री बी.बी. लाल के निर्देशन में यहाँ उत्खनन किया गया, तत्पश्चात् 1998 से 2003 ई. के मध्य पूना के डॉ. वी.एस. शिन्दे एवं पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) के प्रो. ग्रेगरी पोशल के निर्देशन में यहाँ उत्खनन किया गया।
उत्खनन से ताम्रयुगीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं, जिसका समय 1900-1700 ईसा पूर्व (रेडियो कार्बन तिथि के आधार पर) निर्धारित किया गया है।
गिलूण्ड में एक मकान के अवशेष मिले हैं, जिसकी दीवारें धूप में सुखाई गई कच्ची ईंटों से बनी हैं।
दीवारों के मध्य में अनाज भरने की कोठी एवं चूल्हे के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। यहाँ पर पक्की ईंटों से बनी एक दीवार भी मिली है।
गिलून्ड से पाँच प्रकार के मृद्भाण्ड मिले हैं, जिनमें सादे, काले, पालिशदार, भूरे, लाल और काले चित्रित मृद्भाण्ड हैं।
उत्खनन में मिट्टी के खिलौने (हाथी, ऊँट, कुत्ते की आकृति), पत्थर की गोलियाँ (Ballrings) एवं हाथी दाँत की चूड़ियों के अवशेष मिले हैं।
हड्डियों के छोटे-छोटे टुकड़े मिले हैं, जिन्हें जंगली जानवरों की माना गया है, जो मानव के मांसाहारी होने का द्योतक हैं।
एक मटके में गेहूँ के दाने भी मिले हैं।
यहाँ से ताम्र के बने अस्त्र भी प्राप्त हुए हैं।
बालाथल की सभ्यता
उदयपुर जिले की वल्लभनगर तहसील के बालाथल ग्राम में 1993 ई. में पूना विश्वविद्यालय के प्रो. वी.एन. मिश्र के निर्देशन में उत्खनन किया गया।
उत्खनन से प्राप्त मृद्भाण्डों, ताँबे के औजारों और मकानों पर सिंधु घाटी सभ्यता का प्रभाव दिखाई देता है, जिससे सिंधुवासियों से इनका संपर्क होने का अनुमान लगाया गया है।
उत्खनन में अपरिष्कृत मृद्भाण्ड मिले हैं, जो पूरी तरह से पके हुए नहीं हैं।
उत्खनन में मिट्टी से बनी सांड की आकृतियाँ मिली हैं, जिनका प्रयोग संभवतः पूजा के लिए किया जाता था।
पत्थर के मनके, पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ, पशु आकृतियाँ, ताँबे के औजार भी प्राप्त हुए हैं। ताँबे के औजारों में गन्डासे, चाकू, उस्तरे, चूलदार बाणों के अग्रभाग तथा ताँबे के सिक्के मिले हैं जिन पर हाथी और चन्द्रमा की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं।
यहाँ से पाँचवीं सदी ईसा पूर्व का हाथ से बुना कपड़े का एक टुकड़ा भी प्राप्त हुआ है।
बालाथल में 1800 ईसा पूर्व के लगभग ताम्र पाषाणिक सभ्यता तथा 600 ईसा पूर्व के लगभग लौहयुगीन सभ्यता आबाद होने का पुरातत्वशास्त्रियों का अनुमान है।
लौहयुग में यहाँ नलकूप होने के भी संकेत मिले हैं। यहाँ के उत्खनन से लोहे के औजार प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए हैं, लोहा गलाने की पाँच भट्टियों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।
जोधपुरा की सभ्यता
जयपुर जिले में साबी नदी तट पर जोधपुरा गाँव में 1972-75 ई. आर.सी. अग्रवाल एवं विजय कुमार के द्वारा उत्खनन कार्य किया गया।
उत्खनन में गैरिक रंग के पानी पीने के पात्र, कटोरे तथा तश्तरियों के अवशेष मिले हैं। यहाँ से लोहे के शस्त्र, लोहे के बने तीरों के अग्रभाग, लोहे की कीलें, शंख निर्मित चूड़ियों के टुकड़े, कुबड़बैल की आकृतियाँ तथा मिट्टी एवं पत्थर के मनके मिले हैं।
जोधपुरा से लोहा गलाने की भट्टियाँ भी मिली हैं। इन भट्टियों में उपलों का प्रयोग किया जाता था।
यहाँ मकानों की छतों पर टाईल्स का प्रयोग हुआ है।
यह सभ्यता 2500 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के मध्य फली-फूली हुई है।
यहाँ मोर्यकालीन, शुंगकालीन एवं कुषाणकालीन सभ्यता के अवशेष भी मिले है।
पछमाता (राजसमन्द )
यह उदयपुर से 100 किमी. दूर पछमता गाँव से पुरावशेष प्राप्त हुए हैं।
यह आहड़ बनास संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थल है।
यहाँ से कलात्मक वस्तुएँ, जवाहरात, नीले रंग का बहुमूल्य पत्थर, दो भट्टियाँ मिली है।
लाछूरा
यह स्थान आसींद तहसील (भीलवाड़ा) में स्थित है।
इसका उत्खनन बी.आर. मीना द्वारा किया गया।
यहाँ साक्ष्य - शुंगकालीन एवं ताम्रपाषणिक अवशेष मिले है।
एलना - यह जालौर में स्थित ताम्रपाषणिक स्थल है।
मलाह - भरतपुर में स्थित ताम्रपाषणिक स्थल है जहाँ ताँबे की तलवारें व हार्पून मिला है।
कुराडा - यह नागौर में स्थित है जहाँ प्रणाली युक्त अहर्यपात्र मिला है।
किराडोत - यह जयपुर में स्थित ताम्रपाषणिक स्थल है जहाँ 58 ताँबे की चूड़ियाँ मिली है।
निम्नलिखित ताम्रयुगीन स्थलों से ताम्र उपकरण बड़ी मात्रा में मिले है -
1. झाड़ोल (उदयपुर)
2. पिण्डपाडलिया (चित्तौड़गढ़)
3. साबणियाँ एवं पूगल (बीकानेर)
4. बूढ़ा पुष्कर (अजमेर)
5. चीथवाड़ी (जयपुर)
6. कोल-महोली (सवाई माधोपुर)
मध्यपाषाणकालीन स्थल
बागोर की सभ्यता
भीलवाड़ा जिले में स्थित बागोर में कोठारी नदी तट पर महासतियाँ नामक स्थल पर डॉ. वी.एन. मिश्र के निर्देशन में 1967 से 1970 ई. तक उत्खनन कार्य किया गया।
उत्खनन के दौरान यहाँ प्रागैतिहासिक काल की सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो चार से पाँच हजार ईसा पूर्व माने जाते हैं।
सभ्यता के तीन स्तरों के अवशेष प्राप्त हुए है -
प्रथम स्तर 4480-3285 ई. पूर्व माना गया। इस स्तर के उत्खनन से प्राप्त लघुपाषाणास्त्र एवं मृत पशुओं के अवशेष से मानव की भोजन संग्राहक अवस्था एवं शिकार से जीवन निर्वाह करने का अनुमान लगाया जाता है। मृत शरीर का ढाँचा भी मिला है जिसे अपने निवास पर ही पश्चिम-पूर्व दिशा में दफनाया गया था।
दूसरा स्तर जो 2765-500 ईसा पूर्व माना जाता है, से मृद्भाण्डों के अवशेष, धातु अस्त्र, आभूषण तथा भोजन सामाग्री मिली है तथा मृत शरीर पूर्व-पश्चिम दिशा में लेटे हुए मिले हैं। इस युग का मानव पाषाणोपकरण के साथ मिट्टी के बर्तन भी बनाता था तथा शिकार तथा कन्दमूल एकत्र करने के साथ ही वह पशुपालन एवं कृषि करना भी सीख गया था। उत्खनन से प्राप्त अवशेष मृत शरीरों को घरों में गाड़ने तथा उनके साथ बर्तन, खाद्य पदार्थ व उपकरण रखना प्रमाणित करते हैं।
तीसरा स्तर 500 ईसा पूर्व से चौथी सदी तक का माना जाता है। सभ्यता के इस स्तर से लोहास्त्रों के साथ-साथ चाक पर बने मृद्भाण्ड एवं बर्तन मिले हैं जो अच्छी तरह से पके हुए और सुदृढ़ हैं। यहाँ से बड़ी संख्या में लघुपाषाणोपकरण मिले हैं, जो मानव की निर्भरता आखेट पर होना प्रमाणित करते हैं। आवास बनाने के लिए पत्थर के साथ ईंटों का प्रयोग किया गया तथा मृत शरीर उत्तर- दक्षिण दिशा में लिटाया जाने लगा।
बागोर मध्य पाषाण कालीन सभ्यता का स्थल और लघुपाषाणोपकरणों का घर था। पाषाण के उपकरण के साथ-साथ मानव ने यहाँ लोह उपकरणों का प्रयोग भी किया।
ईसवाल
ईसवाल उदयपुर की एक प्राचीन औद्योगिक बस्ती है।
राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के पुरातत्व विभाग द्वारा किए गये उत्खनन से यहाँ से दो हजार वर्ष तक निरंतर लोहा गलाने के प्रमाण मिले हैं।
यहाँ पाँच स्तरों पर बस्तियाँ होने के प्रमाण मिलते हैं, जो प्राक्-ऐतिहासिक काल से मध्य काल तक विकसित थी।
उत्खनन में लौह मल, लौह अयस्क, मिट्टी में प्रयुक्त होने वाले पाइप भी मिले हैं, जिससे यहाँ से पाँच सौ ईसा पूर्व लोहा गलाने का कार्य होने का अनुमान लगाया जाता है।
मौर्य, शुंग व कुषाण काल में यहाँ लोहा गलाने का कार्य होता था।
उत्खनन में हड्डियाँ एवं ऊँट का दाँत मिला है।
मकान पत्थरों से बनाये जाते थे।
तिलवाड़ा की सभ्यता
बाड़मेर जिले में लूणी नदी के तट पर अवस्थित तिलवाड़ा में 1966-67 ई. में एक टीले पर उत्खनन किया गया।
डॉ. वी. एन. मिश्र इस सभ्यता का काल 500 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी तक मानते हैं।
उत्खनन में पाँच आवास स्थलों के अवशेष मिले हैं। यहाँ से चाक पर बने सलेटी व लाल रंग के मृद्भाण्ड, सिलबट्टा, जली हड्डियाँ, बर्तनों व सूक्ष्म उपकरणों के टुकड़े मिले हैं।
यहाँ एक अग्नि कुण्ड भी मिला है, जिसमें मानव अस्थिभस्म तथा मृत पशुओं के अस्थि अवशेष मिले हैं जो यहाँ के मानव की आखेटवृत्ति की पुष्टि करते हैं।
सुनारी सभ्यता
झुंझुनूं जिले की खेतड़ी तहसील में कांटली नदी तट पर अवस्थित सुनारी गाँव से अयस्क से लोहा बनाने की भट्टियों के अवशेष मिले हैं।
ये देश की प्राचीनतम लौह भट्टियाँ मानी जाती हैं। इन भट्टियों में धौंकनी लगाने की व्यवस्था थी, जिससे तापक्रम नियंत्रित किया जाता था।
यहाँ से लोहे के तीर, कृष्ण परिमार्जित मृद्घात्र, मिट्टी तथा पत्थर के मनके, शंख की चूड़ियाँ तथा मृण्मूर्तियाँ भी मिली हैं।
यहाँ से मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ तथा चाक से बने काले रंग के मृद्घात्र मिले हैं, जिन्हें कुषाणकालीन माना जाता है।
सुनारी के निवासी भोजन में चावल का प्रयोग करते थे तथा घोड़ों से रथ खींचते थे।
ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि यहाँ की बस्ती वैदिक आर्यों ने बसाई थी।
चन्दावती
यह स्थान सिरोही में सेवाणी नदी के किनारे स्थित है।
इसकी खोज 1822 में कर्नल जेम्स टॉड द्वारा की गई।
यह पुरातात्विक स्थल लगभग 26 बीघा में विस्तृत है। जिसके मध्य भाग में 33 मन्दिर समूह है। जो हिन्दू व जैन धर्म से सम्बन्धित है। अधिकांश मन्दिर ऊँची जगती पर स्थित है।
यहाँ तीन विशाल भवनों के अवशेष मिले हैं। यहाँ से अनाज के जले बीज, पीसने की घट्टी, घोड़े व मनुष्यों की मृण मूर्तियाँ, मिट्टी व लोहे की वस्तुएँ प्राप्त हुई है।
यहाँ संवत् 1325 का अभिलेख प्राप्त हुआ है। यहाँ पाषाणकालीन उपकरण व शैलचित्र भी मिले है।
जूना खेड़ा - यह स्थल नाडौल, पाली जिले में स्थित है।
अन्य प्रमुख पुरातात्विक स्थल तथा प्राप्त सामग्री -
भीनमाल की सभ्यता
जालौर जिला अंतर्गत अवस्थित भीनमाल से 1953-54 ई. में श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल द्वारा उत्खनन कार्य करवाया गया।
उत्खनन में मृद्भाण्ड तथा शक क्षत्रपों के सिक्के मिले हैं। मृद्घात्रों पर विदेशी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
यहाँ से यूनानी दुहत्थी सुराही भी मिली है, जो यूनान के साथ व्यापारिक संबंधों को प्रकट करती है।
यहाँ से रोमन ऐम्फोरा (सुरापात्र) भी मिला है।
भीनमाल प्राचीन काल में श्रीमाल के नाम से जाना जाता था।
गुप्तकालीन विद्वान ब्रह्मगुप्त की जन्म स्थान भी भीनमाल में था।
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी भीनमाल की यात्रा की।
बैराठ की सभ्यता
प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी बैराठ में (जयपुर जिले) बीजक की पहाड़ी, भोमली की डूंगरी और महादेवजी की डूंगरी पर सिंधु घाटी के समकालीन एवं मौर्यकाल के अवशेष प्राप्त होते हैं।
1937 ई. में दयाराम साहनी ने यहाँ वृहत् स्तर पर उत्खनन कार्य करवाया। तत्पश्चात् 1962-63 ई. में नीलरत्न बनर्जी एवं कैलाशनाथ दीक्षित के निर्देशन में उत्खनन कार्य हुआ।
बैराठ के चारों ओर पत्थरों की प्रचुरता के बावजूद यहाँ के भवनों, मठों, स्तूपों व मंदिरों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया। इन ईंटों की बनावट मोहनजोदड़ो की ईंटों के समान है।
यहाँ 6-7 कमरों का एक खण्डहरनुमा भवन मिला है, जिसे पुरातत्ववेत्ता बौद्धमठ मानते हैं।
यहाँ के उत्खनन में चाँदी की आठ 'पंचमार्क' और इण्डोग्रीक शासकों की 28 मुद्राएँ मिली हैं जो बैराठ पर यूनानी अधिकार प्रमाणित करती हैं। मुद्राएँ खण्डहर में एक भाण्ड में हाथ से बने हुए सूती कपड़े से बँधी मिली हैं।
बैराठ के उत्खनन से मिट्टी के बने पूजा पात्र, थालियाँ, लोटे, मटके, खप्पर, कुंडियाँ, घड़े आदि मिले हैं, लेकिन लोहे व ताँबे की कलाकृतियाँ नहीं मिली हैं।
यहाँ अशोक स्तम्भ एवं एक गोल मंदिर के अवशेष भी मिले हैं, जिसे अशोक द्वारा निर्मित माना जाता है। बैराठ के निकट ही अशोक का भाब्रू अभिलेख प्राप्त हुआ है, जो अशोक को बौद्ध धर्मानुयायी सिद्ध करता है। यह अभिलेख वर्तमान में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल में सुरक्षित है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी बैराठ का उल्लेख किया है। उसने यहाँ के बैल व भेड़ें प्रसिद्ध बताई।
नगरी की सभ्यता
चित्तौड़गढ़ के पास स्थित नगरी को पाणिनी की अष्टाध्यायी में उल्लिखित 'माध्यमिका' माना जाता है।
इस स्थल की 1872 ई. में कार्लाइल द्वारा खोज की गई।
1919- 20 ई. में आर.जी. भंडारकर एवं 1961-62 ई. में के.बी. सौन्दर राजन द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया।
यहाँ के उत्खनन से लेखयुक्त शिलाएँ, मृण्मूर्तियाँ, प्रतिमाएँ, अंलकरण युक्त ईंटें, गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष, जिसमें शिव मूर्ति प्रतिष्ठापित थी, मिले हैं।
ग्रीक-रोमन प्रभाव से युक्त पुरुष शीर्ष, आहत एवं शिवि जनपद के सिक्के भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं।
यहाँ से चार चक्राकार कुएँ एवं गुप्तयुगीन अवशेष भी मिले हैं।
नोह की सभ्यता
भरतपुर जिले के नोह गाँव में 1963-64 ई. में श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में हुए उत्खनन से ताम्रयुगीन सभ्यता प्रकाश में आई।
रेडियो कार्बन तिथि के आधार पर ये अवशेष 1100 से 900 ईसा पूर्व के माने गए हैं।
यहाँ से पाँच सांस्कृतिक युगों के अवशेष मिले हैं -
सबसे निचले स्तर से गेरू रंग के मृद्धात्र व सादे काले और लाल मिट्टी के पात्रों के अवशेष मिलते हैं।
द्वितीय स्तर से चित्रित सलेटी रंग के पात्र तथा काले चमकदार पात्र मिलते हैं।
तीसरे स्तर से चित्रित सलेटी रंग के पात्रों के अवशेषों के साथ-साथ काले ओपदार मृद्भाण्ड तथा लोहे के बाणों की नोक मिली हैं।
चौथे स्तर से मिट्टी की कच्ची ईंटों से बना एक परकोटा मिला जो प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है।
ऊपरी स्तर से भिन्न शासकों के ताँबे के सिक्के, मानव एवं पशुओं की मृण्मय कलाकृतियाँ मिली हैं।
यहाँ से प्रस्तर की विशालकाय यक्ष प्रतिमा और चुनार के चिकने पत्थर के टुकड़े मिले हैं, जिन पर मौर्यकालीन पॉलिश है।
यहाँ से लोहे के कृषि संबंधी उपकरण एवं चक्रकूपों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
यहाँ के निवासी मकान बनाने के लिए पक्की ईंटों का प्रयोग करते थे।
कुषाण नरेश हुविस्क एवं वासुदेव के सिक्के भी यहाँ से मिले हैं।
नलियासर की सभ्यता
जयपुर ग्रामीण जिले में सांभर के निकट नलियासर गाँव में उत्खनन के दौरान आहत मुद्राएँ, उत्तर इण्डोससेनियन सिक्के, कुषाण शासक हुविस्क, इण्डोग्रीक, यौधेय गण एवं गुप्तयुगीन चाँदी के सिक्के मिले हैं।
यहाँ से स्वर्ण निर्मित सिंह सिर, ताँबे के पात्र, मिट्टी के बाट, झुनझुने, तलवार, अलंकरण युक्त ईंटें, नालियों के गोल पाइप, पूजा पात्र, मिट्टी के आभूषण, मनके, शीशे की चूड़ियाँ, सिलबट्टे, हड्डी के पासे, काँसे के कड़े तथा 105 कुषाणकालीन मुद्राएँ मिली हैं।
सांभर के उत्खनन से प्राप्त सामग्री इस संस्कृति को तीसरी सदी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी तक का सिद्ध करती है।
नगर की सभ्यता
टोंक जिले में अवस्थित नगर के उत्खनन से 6000 मालव सिक्के मिले हैं।
महाभारत में उल्लिखित मालवों की राजधानी कार्कोट नगर का समीकरण इससे किया जाता है।
यहाँ से लाल रंग के मृद्भाण्ड एवं अनाज भरने के कलात्मक मटकों के अवशेष तथा विभिन्न कलात्मक वस्तुएँ, आभूषण, लौह उपकरण, मिट्टी के बर्तन, मुद्राएँ एवं प्रतिमाएँ मिली हैं।
इन्हें पहली शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईसा तक का माना जाता है।
नगर के उत्खनन से गुप्तोत्तरकालीन स्लेटी पत्थर से बनी महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा, एकमुखी शिवलिंग, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी आदि की प्रतिमाएँ मिली हैं।
रैढ़ की सभ्यता
टोंक जिले की निवाई तहसील में स्थित रैढ़ में 1938 ई. में के.एन. पुरी द्वारा उत्खनन करवाया गया।
उत्खनन में मिट्टी के मकान, लौह उपकरण, पाषाण के मनके, मृण्मूर्तियाँ तथा अनाज के दाने प्राप्त हुए हैं।
यहाँ से 115 घेरेदार कूप तथा तीन हजार आहत मुद्राएँ मिली हैं, जिनमें मालव तथा मिस्त्र शासकों एवं अपोलोडोट्स का सिक्का तथा इण्डोससेनियन सिक्के प्रमुख हैं।
यहाँ से प्राप्त सीसे की एक मुहर पर मालव 'जनपद स' ब्राह्मी लिपि में अंकित है, जो यहाँ मालव आधिपत्य को सूचित करता है।
यहाँ से सेलखड़ी की एक डिबिया मिली है, जो उन डिबियों के समान है, जिनमें बौद्ध भिक्षुओं के अवशेष रखे जाते थे।
यहाँ से प्राप्त अवशेष तीसरी सदी ईसा पूर्व से दूसरी सदी ई. तक के हैं, जिन्हें मौर्य व शुंगकालीन माना जाता है।
लोहे के औजार अत्यधिक मिलने के कारण रैढ़ को प्राचीन राजस्थान का 'टाटानगर' भी कहा जाता है।
गरड़दा (बूंदी) - यहाँ देश की पहली बर्ड राइडर रॉक पेन्टिंग मिली है। (शैल चित्र)
ओला क्षेत्र (जैसलमेर) - यहाँ से पाषाणकालीन कुल्हाड़ी मिली है।
डाड़ाथोरा (बीकानेर) - यहाँ से मध्यपाषाण काल के अवशेष मिले है।
उड़ीकर (अलवर) - इस स्थल से पाषाणकालीन शैल चित्र प्राप्त हुए हैं।
तिपटियाँ (कोटा) - इस स्थल से पाषाणकालीन शैल चित्र प्राप्त हुए हैं।
जहाजपुर (भीलवाड़ा) - इस स्थल से महाभारतकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
गुरारा (सीकर) - यहाँ से ताँबे के 2744 पंचमार्क सिक्के प्राप्त हुए हैं।
परेवार एवं सोनू क्षेत्र (जैसलमेर) - यहाँ चूहे के दाँत के प्राचीनतम जीवाश्म खोजे गए हैं।
जायल, डीडवाना (नागौर) - इन पुरापाषाणकालीन स्थलों से हस्तकुठार (हैण्डएक्स), विदारणी, चापर नामक पत्थर के उपकरण प्राप्त हुए हैं।
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