राजस्थान के लोकदेवता
- पाबूजी राठौड़
- इनका जन्म (1239 ई.) 13 वीं शताब्दी में फलौदी (जोधपुर) के निकट कोलूमण्ड में धांधल जी राठौड़ एवं कमला दे के घर हुआ।
- ये फेरों के बीच उठकर अपने बहनोई जीन्दराव खींची से देवल चारणी (जिसकी घोड़ी केसर कालमी माँग कर लाये) की गायें छुड़ाने चले गये।
- देचू गाँव में युद्ध (1276 ई.) में वीरगति को प्राप्त हुए।
- अर्द्धविवाहित सोढ़ी पाबूजी के साथ सती हो गई।
- अतः इन्हें गौरक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है।
- इनको लक्ष्मण का अवतार माना जाता है तथा मेहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजते है।
- पाबूजी प्लेग रक्षक एवं ऊटों के देवता के रूप में पूज्य हैं।
- पाबूजी को मारवाड़ में ऊँट लाने का श्रेय है।
- ऊँट पालक राइका (रेबारी) जाति इन्हें अपना आराध्य मानती है।
- पाबूजी केसर कालमी घोड़ी, बायीं और झुकी पाग के लिए प्रसिद्ध, इनका प्रतीक चिन्ह-भाला है।
- कोलूमण्ड में इनका प्रमुख मंदिर है जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को मेला भरता है।
- 'पाबूजी के पवाड़े' माठ वाद्य के साथ नायक व रेबारी जाति द्वारा गाए जाते है।
- चाँदा-डेमा एवं हरमल पाबूजी के रक्षक सहयोगी के रूप में जाने जाते हैं।
- पंचसाथी - चाँदोजी, सावंत जी, डेमा जी, हरमल जी व सलजी सोलंकी इनके पंचसाथियों की श्रेणी में आते हैं।
- 'पाबू प्रकाश': आशिया मोड़जी द्वारा पाबूजी के जीवन पर लिखी गई महत्त्वपूर्ण रचना है।
- पाबूजी की फड़ - नायक या 'आयडी' जाति के भोपे रावण हत्था नामक वाद्य पर इस फड़ का वाचन करते है।
- यह सबसे लोकप्रिय फड़ है।
- फड़ में सामने भाले का चित्र तथा पाबूजी की घोड़ी 'केसर कालमी' काले रंग से चित्रित की जाती है।
- पाबूजी- 'नैणसी री ख्यात में उल्लेख मिलता है कि पाबूजी ने मलेच्छ समझी जाने वाली 'थोरी' जाति के 7 भाईयों को न केवल शरण दी अपितु समाज में सम्मानजनक स्थान दिलवाने हेतु अथक प्रयास किया।
- पाबूजी के अनुयायी 'थोरी' है जो पाबूजी की फड़ और पाबूजी रा पवाड़ा गाकर संदेश घर-घर पहुँचाते हैं।
- गोगाजी चौहान
- गोगाजी का जन्म चूरू जिले के ददरेवा नामक स्थान पर जेवर सिंह व बाछल के घर हुआ।
- गोगाजी ने दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह से युद्ध किया।
- इस युद्ध में गोगाजी के दो मौसेरे भाई अरजन व सरजन भी बादशाह की ओर से लड़ रहे थे। वे दोनों मारे गए।
- ये सापों के देवता माने जाते हैं तथा इन्हें जाहरपीर के नाम से पूजा जाता है।
- ये महमूद गजनवी व गुरू गोरखनाथ के समकालीन थे।
- वंश भास्कर में इन्हें गौ रक्षार्थ वीरगति प्राप्त करना बताया है।
- हिन्दू व मुस्लिम दोनों सम्प्रदाय गोगाजी की आराधना करते हैं।
- हिन्दू नागराज तो मुस्लिम गोगापीर के रूप में पूजा करते है।
- राजस्थान के किसान वर्षा के बाद हल जोतने से पहले गोगाजी के नाम की राखी 'गोगा राखड़ी' हल व हाली दोनों को बांधते हैं।
- गोगोजी के जन्म स्थल ददरेवा को शीर्ष मेड़ी, समाधि स्थल 'गोगा मेड़ी' (नोहर-हनुमानगढ़) को 'धुरमेड़ी' भी कहते है।
- गोगामेड़ी में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगानवमी) को विशाल मेला भरता है।
- गोगामेडी की बनावट मकबरा नुमा है इसके प्रवेश द्वार पर बिस्मिल्लाह शब्द अंकित है।
- महाराजा गंगासिंह ने वहाँ गोगाजी की प्रतिमा स्थापित कर उसे मंदिर का स्वरूप दिया।
- सांचौर (जालौर) में भी 'गोगाजी की ओल्ड़ी' नामक स्थान पर गोगाजी का मंदिर है।
- कहावतः गाँव-गाँव खेजडी अर गाँव-गाँव गोगो।
- विवाह से पहले ही इनकी बनने वाली पत्नि केलमदे को सांप ने डस लिया था।
- गोगाजी की सवारी नीली घोड़ी थी।
- गोगाजी के गुरू- गोरखनाथ थे।
- नोटः इन्होंने गौ-रक्षा तथा मुस्लिम आक्रान्ता महमूद गजनबी से युद्ध करते हुए देश रक्षार्थ प्राण न्योछावर किये।
- तेजा जी
- इनका जन्म नागवंशीय जाट परिवार में 1073 ई. में नागौर जिले के खड़नाल में ताहड़ जी और रामकुंवरी के यहाँ माघ शुक्ल चतुर्दशी को हुआ था।
- तेजाजी का विवाह पेमलदे के साथ हुआ।
- जब तेजाजी अपनी पत्नी पेमल को लेने अपने ससुराल पनेर गये हुए थे, तब उसी दिन मेर लोग लाछा गूजरी की गायें चुरा कर ले गये।
- गूजरी की प्रार्थना पर वे गायों को मुक्त कराने जा ही रहे थे की रास्ते में इन्हें सुरसुरा नामक स्थान पर इन्हें एक सर्प मिला।
- तेजाजी ने सर्प को डसने से रोकते हुए वचन दिया कि वे गायों को मुक्त कराने के बाद स्वयं यहाँ आयेंगे।
- भीषण संघर्ष के बाद तेजाजी ने गायें मुक्त कराने में सफलता प्राप्त की।
- गायों के मुक्ति दाता तथा नागों के देवता के रूप पूज्य तेजाजी के अजमेर एवं जयपुर जिले के लगभग हर गाँव में चबूतरे है।
- इनके चबूतरे पर पत्थर पर एक घुड़सवार व सर्प का चित्र उर्कीण है।
- इनके पुजारी को घोड़ला तथा चबूतरे को थान कहते है।
- तेजाजी की मूर्तियों के उत्कीर्णन में तलवार धारी अश्वारोही योद्धा के रूप में चित्रित किया जाता है जिनकी जिह्वा की सर्प द्वारा दंशित करते हुऐ प्रदर्शित किया जाता है।
- लोकदेवता तेजाजी की सर्प दंश के कारण सुरसुरा (किशनगढ़) में भाद्रपद शुक्ल पक्ष दशमी को मृत्यु हुई थी।
- अजमेर जिले में इनके मुख्य स्थानः सुरसुरा, ब्यावर, सैदरिया और भांवता में है।
- ब्यावर के तेजा चौक स्थित प्राचीन थान पर प्रतिवर्ष भादवा सुदी दशमी को तेजाजी का मेला भरता है।
- इनकी मृत्यु का समाचार घोड़ी लीलण द्वारा उनके घर पहुंचाया गया।
- वीर तेजाजी को काला और बाला के देवता और कृषि कार्यों का उपासक देवता के रूप में भी पूजा जाता है।
- राजस्थान के जाट तेजाजी के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रखते है।
- पाबूजी
- पाबूजी का विवाह अमरकोट के सूरजमल सोढ़ा की पुत्री सोढ़ी के साथ हुआ था।
- विवाह के मध्य ही उनके प्रतिद्वंद्वी बहनोई जायल (नागौर) नरेश जींदराव खींची ने पूर्व वैर के कारण देवल चारणी की गायों को घेर लिया।
- देवल ने पाबूजी से गायों को छुड़ाने की प्रार्थना की।
- तीन फेरे लेने के पश्चात् चौथे फेरे से पूर्व ही वे देवल चारणी की केसर कालमी घोड़ी पर सवार होकर गायों की रक्षार्थ रवाना हो गये।
- कड़े संघर्ष में 1276 ई. में पाबूजी अनेक साथियों सहित वीर-गति को प्राप्त हुए।
- वीरता, प्रतिज्ञापालन, त्याग, शरणागत वत्सलता एवं गौ-रक्षा हेतु बलिदान होने के कारण जनमानस इन्हें लोक देवता के रूप में पूजता है।
- इनका मुख्य पूजा स्थल कोलू (फलौदी) में है।
- जहाँ प्रतिवर्ष इनकी स्मृति में मैला लगता है।
- इनका प्रतीक चिह्न हाथ में भाला लिए अश्वारोही के रूप में प्रचलित है।
- पाबूजी का जन्म (1239 ई.) 13 वीं शताब्दी में फलौदी (जोधपुर) के निकट कोलूमण्ड में धांधल जी राठौड़ एवं कमला दे के घर हुआ।
- अर्द्धविवाहित सोढ़ी पाबूजी के साथ सती हो गई।
- अतः इन्हें गौरक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है।
- इनको लक्ष्मण का अवतार माना जाता है तथा मेहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजते है।
- पाबूजी प्लेग रक्षक एवं ऊटों के देवता के रूप में पूज्य हैं।
- पाबूजी को मारवाड़ में ऊँट लाने का श्रेय है।
- ऊँट पालक राइका (रेबारी) जाति इन्हें अपना आराध्य मानती है।
- पाबूजी केसर कालमी घोड़ी, बायीं और झुकी पाग के लिए प्रसिद्ध, इनका प्रतीक चिन्ह-भाला है।
- कोलूमण्ड में इनका प्रमुख मंदिर है जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को मेला भरता है।
- 'पाबूजी के पवाड़े' माठ वाद्य के साथ नायक व रेबारी जाति द्वारा गाए जाते है।
- रामदेवजी
- तंवर वंशीय अजमालजी और मैणादे के पुत्र रामदेवजी का जन्म बाड़मेर जिले की शिव तहसील के ऊँडूकासमेर गाँव में हुआ।
- इन्हें मल्लीनाथजी के समकालीन माना जाता है।
- बालपन में ही इन्होंने पोकरण क्षेत्र मल्लीनाथजी से प्राप्त करने के पश्चात् वहाँ भैरव नामक क्रूर व्यक्ति का अंत करके अराजकता एवं आतंक खत्म किया।
- इनका विवाह अमरकोट के दलजी सोढ़ा की पुत्री नेतलदे से हुआ था।
- अपनी भतीजी को पोकरण दहेज में दे देने के बाद इन्होंने रामदेवरा' (रुणेचा) गाँव बसाया।
- वहीं 1458 ई. में भाद्रपद शुक्ल एकादशी को जीवित समाधि ले ली।
- यहाँ भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को विशाल मेला लगता है।
- सांप्रदायिक सद्भाव इस मेले की मुख्य विशेषता है।
- हिन्दू जहाँ श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में इनकी आराधना करते हैं।
- वहीं मुसलमान 'रामसा-पीर' क रूप में रामदेवजी को पूजते हैं।
- सामान्यतः गाँवों में किसी वृक्ष के नीचे ऊँचे चबूतरे पर रामदेवजी के प्रतीक चिह्न 'पगलिये' स्थापित किये जाते है। ये स्थान 'थान' कहलाते हैं।
- रामदेवजी द्वारा कामड़िया पंथ की स्थापना की गई।
- इस पंथ के अनुयायियों द्वारा रामदेवजी के मेल में तेरहताली नृत्य प्रस्तुत किया जाता है।
- रामदेवजी वीर होने के साथ-साथ समाज-सुधारक भी थे इन्होंने जाति प्रथा, मूर्तिपूजा और तीर्थयात्रा का विरोध किया।
- रामदेव जी का फड़ः
- कामड जाति के भोपे रावण हत्था नामक वाद्य पर इसका वाचन करते है।
- रामदेव जी की फड़ का चित्रांकन सर्वप्रथम चौथमल चितेरे ने किया।
- रामदेवजी एक मात्र ऐसे लोक देवता है जो कवि भी थे।
- इनके द्वारा रचित 'चौबीस वाणियाँ' प्रसिद्ध है।
- रामदेव जी के नाम पर भाद्रपद द्वितीया व एकादशी को रात्रि जागरण किया जाता है। जिसे 'जम्मा' कहते है।
- रामदेवरा (रूणीचा) में रामदेव जी का विशाल मंदिर है।
- यहाँ हर वर्ष भाद्रपद शुक्ला द्वितीया से एकादशी को विशाल मेला भरता है।
- भाद्रपद शुक्ला द्वितीया 'बाबे री बीज' (दूज) के नाम से पुकारी जाती है।
- यह तिथि रामदेव जी के अवतार की तिथि के रूप में भी लोक प्रचलित है।
- देवनारायण जी
- देवनारायणजी का जन्म बगडावत (नागवंशीय गुर्जर) वंश के सवाई भोज व सेंडू (सेंदू) खटाणी के घर 1243 ई. को हुआ।
- गुर्जर जाति - लोग इन्हें विष्णु का अवतार मानते है।
- इनके बचपन का नाम उदय सिंह था।
- देवनारायण जी की पत्नी का नाम पीपलदे था। (धार के शासक जयसिंह की पुत्री थी)
- इनके जन्म से पूर्व ही इनके पिता भिनाय के शासक के साथ संघर्ष में अपने तेईस भाइयों सहित मारे गए।
- देवनारायण जी का अंतिम समय ब्यावर जिले में स्थित देवमाली (देमाली) पर गुजरा।
- इनके पुत्र का नाम बीला व पुत्री का नाम बीली था।
- बीला उनका प्रथम पुजारी हुआ।
- देवनारायणजी ने जनता के दुखों को दूर करने के लिए अपने पराक्रम व सिद्धियों का प्रयोग कर सहयोगियों के साथ तत्कालीन आतंक व अत्याचार को दूर किया।
- देवमाली (ब्यावर) में देह त्यागी।
- देवनारायणजी का मूल 'देवरा' आसींद (भीलवाड़ा) में है।
- इनके अन्य प्रमुख देवरे - देवमाली (ब्यावर), देवधाम जोधपुरिया (निवाई, टोंक) व देव डूंगरी पहाड़ी (चित्तौड़) में है।
- देवमाली (ब्यावर) गाँव को बगड़ावतों का गाँव कहा जाता है।
- यहाँ पर देवनारायण व सवाई भोज के मंदिर हैं।
- इनके देवरे में उनकी प्रतिमा के स्थान पर बड़ी ईटों की पूजा की जाती है।
- पूजा सामग्री में नीम की पत्ती अवश्य शामिल की जाती है।
- मेला - भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को भरता है।
- इन्होंने गायों की रक्षार्थ ही भिनाय ठाकुर को मारा था।
- अतः इन्हें गौरक्षक लोक देवता के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
- मल्लीनाथजी
- मल्लीनाथजी का जन्म मारवाड़ के रावल सलखा और जाणीदे के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में 1358 ई. में हुआ।
- पिता की मृत्यु के पश्चात् वे चाचा कान्हड़दे के यहाँ महेवा में शासन प्रबंध देखने लगे।
- चाचा कान्हड़देव की मृत्यु के बाद वे 1374 ई. में महेवा के स्वामी बन गए।
- राज्य विस्तार के क्रम में 1378 ई. में फिरोज तुगलक के मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन की सेना को इन्होंने मार भगाया।
- अपनी रानी रूपांदे की प्रेरणा से वे 1389 ई. में उगमसी भाटी के शिष्य बन गये और योग-साधना की दीक्षा प्राप्त की।
- किंवदन्तियों के अनुसार वे भविष्यद्रष्टा एवं देवताओं की तरह चमत्कार प्राप्त सिद्ध पुरुष बन गए थे।
- मल्लीनाथजी ने मारवाड़ के सारे संतों को एकत्र करके 1399 ई. में एक वृहत् हरि-कीर्तन आयोजित करवाया।
- इसी वर्ष चैत्र शुक्ल द्वितीया को इनका स्वर्गवास हो गया।
- लूनी नदी के तटवर्ती तिलवाड़ा (बाड़मेर) गाँव में इनका मंदिर है।
- जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक विराट पशु-मेला लगता है।
- जोधपुर के पश्चिमी परगने का नामकरण इन्हीं के नाम पर 'मालानी' किया गया था।
- इनकी आज भी मालानी (बाड़मेर) में अत्यधिक मान्यता है।
- वीर कल्ला जी
- कल्ला जी मेड़ता के राव जयमल राठौड़ के छोटे भाई आससिंह के पुत्र थे।
- मीरा इनकी बुआ थी।
- इनका जन्म 1544 ई. में मेड़ता के निकट सामियाना गाँव (नागौर) में हुआ था।
- बाल्यावस्था से ही कल्ला जी अपनी कुलदेवी नागणेची की आराधना करते थे।
- ये अस्त्र-शस्त्र चलाने और औषधि विज्ञान में भी निपुण थे।
- चित्तौड़ के तीसरे शाके (1568 ई.) में अकबर के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- युद्ध भूमि में चतुर्भज के रूप में दिखाई वीरता के कारण चार हाथों वाले देवता के रूप में प्रसिद्ध है।
- युद्ध के दौरान कल्ला जी ने युद्ध में घायल जयमल को दोनों हाथों में तलवार पकड़ाकर उसे अपने कंधे पर बिठा लिया और स्वयं भी दो तलवारें लेकर युद्ध करने लगे।
- जयमल और कल्ला जी दोनों ने शत्रु सेना में तबाही मचा दी।
- इसी वीरता के कारण उनकी ख्याति चार हाथ, दो सिर वाले देवता के रूप में हुई।
- इनकी पूजा नागरूप में भी की जाती है।
- ऐसा माना जाता है कि वे शेषनाग के अवतार थे।
- डूंगरपुर जिले के सामलिया गाँव में कल्ला जी की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है।
- इस मूर्ति पर प्रतिदिन केसर तथा अफीम चढ़ाई जाती है।
- केहर, कमधण, कमधज, योगी, बाल ब्रह्मचारी, कल्याण आदि नामों से पूजनीय कल्ला जी के मध्यप्रदेश, मारवाड़, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर और मेवाड़ में करीब पाँच सौ मंदिर हैं।
- इनके मंदिरों के पुजारी सर्पदंश से पीड़ित लोगों का उपचार करते हैं।
- हड़भूजी
- हड़भूजी की भी लोक देवता के रूप में पूजा की जाती है।
- ये भूडोल (नागौर) के सांखलावंशीय मेहाजी के पुत्र और रामदेवजी के मौसेरे भाई थे।
- ये जोधपुर के शासक राव जोधा (1438-89 ई.) के समकालीन थे।
- रामदेवजी की प्रेरणा से इन्होंने अस्त्र- शस्त्र त्याग दिये और गुरु बालीनाथ से दीक्षा ली।
- हड़भूजी चमत्कारी महापुरुष, वचनसिद्ध और शकुनशास्त्र के ज्ञाता थे।
- राव जोधा ने इन्हें बेंगटी गाँव (फलौदी) भेंट किया।
- इसी गाँव में हड़भूजी का मंदिर है जहाँ हड़भूजी की गाड़ी सुरक्षित रखी हुई है, जिसकी पूजा की जाती है।
- यहाँ के पुजारी साँखला राजपूत ही होते हैं।
- तल्लीनाथजी
- तल्लीनाथजी मण्डोर के वीरमदेव के पुत्र थे।
- इनका प्रारंभिक नाम गांगदेव था।
- संन्यास ग्रहण करने के बाद इन्होंने गुरु जलन्धर राव से दीक्षा ली।
- इनकी पूजा जालौर जिले में अधिक की जाती है।
- पांचोटा गाँव (जालौर) में पंचमुखी पहाड़ी पर इनका मुख्य पूजा स्थल है, जहरीले कीड़ों के काटने पर इनकी पूजा की जाती है।
- गाँव के किसी व्यक्ति या पशु के बीमार पड़ने या जहरीला कीड़ा काटने पर इनके नाम का ड़ोरा बांधते हैं।
- मेहाजी मांगळिया
- मेहाजी मांगळिया राजस्थान के पंचपीरों में गिने जाते हैं।
- ये राव चूण्डा के समकालीन थे।
- इनका जन्म पंवार क्षत्रिय परिवार में हुआ था।
- किंतु पालन-पोषण अपने ननिहाल में मांगळिया गोत्र में हुआ था, इसलिए ये मेहाजी मांगळिया के नाम से प्रसिद्ध हुए।
- इनके स्वाभिमानी स्वभाव के कारण इनके अनेक शत्रु हो गये।
- अंत में जैसलमेर के राव राणगदेव भाटी से युद्ध करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए।
- वे अच्छे शकुन शास्त्री थे।
- लोगों की सेवा, सहायता करने एवं उन्हें संरक्षण देने के कारण वे लोक देवता के रूप पूजे गये।
- बापणी में इनका मन्दिर है, जहाँ भाद्रपद कृष्णा अष्टमी को मेला भरता है।
- हड़भूजी
- हड़भूजी की भी लोक देवता के रूप में पूजा की जाती है।
- ये भूडोल (नागौर) के सांखलावंशीय मेहाजी के पुत्र और रामदेवजी के मौसेरे भाई थे।
- ये जोधपुर के शासक राव जोधा (1438-89 ई.) के समकालीन थे।
- रामदेवजी की प्रेरणा से इन्होंने अस्त्र- शस्त्र त्याग दिये और गुरु बालीनाथ से दीक्षा ली।
- हड़भूजी चमत्कारी महापुरुष, वचनसिद्ध और शकुनशास्त्र के ज्ञाता थे।
- राव जोधा ने इन्हें बेंगटी गाँव (फलौदी) भेंट किया।
- इसी गाँव में हड़भूजी का मंदिर है जहाँ हड़भूजी की गाड़ी सुरक्षित रखी हुई है, जिसकी पूजा की जाती है।
- यहाँ के पुजारी साँखला राजपूत ही होते हैं।
- बिग्गाजी
- गौ-सेवक एवं गौ-रक्षक बिग्गाजी का जन्म बीकानेर जिले के रोड़ी गाँव में हुआ था।
- इनके पिता का नाम राव महन तथा माता का नाम सुल्तानी था।
- बिग्गाजी को गायों से विशेष लगाव था और इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन गायों की सेवा में लगा दिया।
- गायों की रक्षार्थ ही लुटेरों से संघर्ष करते हुए ये वीर गति को प्राप्त हुए।
- जाखड़ गोत्र के जाट इन्हें अपना कुलदेवता मानते हैं।
- बिग्गाजी का मंदिर उनके जन्म स्थल रोड़ी गाँव में बना हुआ है।
- मंदिर में हर वर्ष 14 अक्टूबर को वीर बिग्गाजी का मेला लगता है।
- मामा देव
- मामा देव राजस्थान के ऐसे लोक देवता हैं, जिनकी मिट्टी-पत्थर की मूर्तियाँ नहीं बनती बल्कि लकड़ी का एक विशिष्ट व कलात्मक तोरण होता है।
- जो गाँव के बाहर मुख्य सड़क पर प्रतिष्ठापित किया जाता है।
- मामा देव बरसात के देवता माने जाते हैं।
- इन्हें भैंसे की बलि दी जाती है।
- वीर फत्ताजी
- वीर फत्ताजी का जन्म जालौर जिले के साथू गाँव में हुआ था।
- लुटेरों से गाँव की रक्षा करते हुए इन्होंने प्राण उत्सर्ग कर दिए।
- साथू गाँव (जालौर) में इनका विशाल मंदिर है।
- जहाँ भाद्रपद शुक्ला नवमी को मेला लगता है।
- बाबा झुंझार जी
- सीकर जिले के इमलोहा गाँव में राजपूत परिवार में जन्मे झुंझार जी ने मुस्लिम लुटेरों से गाँव की रक्षा करते हुए प्राण न्योछावर किये।
- स्यालोदड़ा गाँव (सीकर) में तीन भाइयों व दूल्हा-दुल्हन के पाँच प्रस्तर स्तम्भ बने हुए है।
- स्यालोदड़ा में प्रतिवर्ष रामनवमी को झुंझार जी का मेला भरता है।
- इनका स्थान प्राय खेजड़ी वृक्ष के नीचे होता है।
- हरिराम जी
- ये सर्पदंश का इलाज करते है।
- सुजानगढ़-नागौर मार्ग पर झोरड़ा गाँव (चुरू) में इनका मंदिर है।
- मंदिर में साँप की बाबी एवं बाबा के प्रतीक के रूप में चरण कमल है।
- रूपनाथ (झरड़ा)
- ये पाबूजी के बड़े भाई बूढ़ो जी के पुत्र थे।
- इन्होंने पिता व चाचा की मृत्यु का बदला जींदराव खींची को मारकर लिया।
- हिमाचल प्रदेश में इन्हें 'बालकनाथ' के रूप में पूजा जाता है।
- इनका थानः कोलूमण्ड (जोधपुर) की पहाड़ी पर, बीकानेर के सिंभूदड़ा (नोखामण्डी) में स्थित है।
- आलम जी
- ये जैतमलोत राठौड़ थे।
- बाड़मेर जिले के मालाणी प्रदेश में लूनी नदी के किनारे स्थित राड़धरा क्षेत्र में इन्हें लोक देवता के रूप में पूजा जाता है।
- ढ़ांगी नाम के रेतीले टीले पर इनका स्थान बना हुआ है, जिसे आलम जी का धोरा भी कहते है।
- यहाँ भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मेला भरता है।
- वीर पनराज जी
- 16 वीं सदी में जैसलमेर के नया गाँव के क्षत्रिय परिवार में जन्म लिया।
- कठौडी गाँव के ब्राह्मण परिवार की गायों को मुस्लिम लुटेरों से बचाते हुऐ प्राण न्योछावर किये।
- इनकी स्मृति में पनराजसर गाँव में वर्ष में दो बार मेला भरता है।
- इलोजी
- राजस्थान के मारवाड़ में छेड़छाड़ के अनोखे लोकदेव के रूप में पूज्य इलोजी अविवाहितो को दुल्हन, नव दम्पितियों को सुखद गृहस्थ जीवन और बांझ स्त्रियों को संतान देने में सक्षम है।
- इलोजी क्षत्रिय व गाछी जाति में लोकप्रिय हैं।
- इनकी मनौती कुमकुम रोली से मनाई जाती है।
- ये जीवनभर कुँवारे रहे।